Friday, December 27, 2019

गांधीजी चाहते थे कांग्रेस, आज़ादी के बाद dissolve कर दी जाय। बहुत लंबी और ईमानदार सोच थी। पर गाँधी के उत्तराधिकारी और अपने ऊपर आज़ादी दिलवाने का श्रेय, मुसलमानों के रहनुमा बनने का नाटक इन सब से जनता  को बेवकूफ बना कर राज करने का लोभ इससे कौन बच सकता है? नेहरू जैसे लोग तो कादापी नहीं. वे तो तीन मूर्ती जैसे आलेशान बंगले  मे रहने का छोता मोता लोभी भी नहीं संभाल पाये. राजाओं की तरह रहते थे  बल्की उनसे भी बढ कर. डॉक्टर लोहिया ने उस ज़ामाने में ऊंकी अय्याशियों पर सावाल खड़े किये  थे. आज के समाजवादियों को ये फिजुल की बाते लगाती होंगी.

कारण है कि इन 70 /72 वर्षों में कांग्रेस ने सभी दलों को प्रेरित और प्रभावित करके अपने रंग मे ढाल दिया है। जनता को बेवकूफ बनाने से लेकर, बेईमानी, भ्र्ष्टाचार, झूठ, अय्याशी , वोटबैंक पॉलिटिक्स - सभी तरह से अन्य दलों के चरित्र को भ्रष्ट कर दियाहै। इसका एक मात्र श्रेय कांग्रेस को जाता है।

सत्ता के लोभ में देश हित, लंबी सोच अक्सर ताक पर रख दी जाती रही है। कश्मीर उसका ज्वलंत उदाहरण है। लंबी सोच तो लगभग नदारद है। लफ़्फ़ाज़ी सिर्फ भाजपा या मोदी जी ही नहीँ करते यह परंपरा पुरानी है। और कांग्रेस की डाली हुई है। भाजपा और मोदी ने एक भी ऐसा काम नही किया है जो इससे पहले कांग्रेस ने नही किया हो। कोई भी गड़बड़। जिसकी आज आलोचना हो रही है। बच्चे जब झगड़ते है तो एक थप्पड़ मारे औरदूसरा घूसा मार दे तो पहले वाले को शिकायत यह होती है कि 'मैंने तो थप्पड़ मारा था, तुमने घूसा क्यों मारा' . वह भूल जाता है कि लड़ाई की शुरुआत किसने की। यही हाल है आज की राजनीति का। इन सब के बावजूद एक फर्क यह लगता है कि कांग्रेस के चरित्र का इतना ह्रास हो चुका है और वे इतने लंबे समय राज कर चुके है कि उनके अंतराष्ट्रीय शक्तियों से संबंध पक चुके है और अफसरशाही में उनकी पैठ अंदर तक है। भारत के सत्ता वर्ग में भी उन्हीं के लोग अभी भी भरे पड़े हैं। यह उनकी ताकत है। इस तंत्र को तोड़ना आसान नही। यह टूटे तो बात बने। दूसरा कांग्रेस पूरी तरह खत्म नही होगी तब तक भाजपा का विकल्प भी खड़ा नही होगा।

वर्तमान लड़ाई मुसलमानों के साथ है ही नही। यह तो बनाई जा रही है अपने अस्तित्व की लड़ाई है कांग्रेसी अस्तित्व की।

पवन कुमार गुप्त
दिसंबर 28, 2019
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 यह तंज़ में नहीं कहा जा रहा। आप इसपर विश्वास करके मुझे पढ़े। मैंने ज़्यादा पढ़ाई नहीं की है। मैं सोशल साइंस का विद्यार्थी भी नहीं रहा। हाँ पीछे 35/40 वर्षों से छुटपुट अलग अलग चीज़े बेतरतीब ढंग से पढ़ी है। पर हाँ कुछ अच्छे लोग किस्मत से मिल गए उनसे चर्चा करके, उनकी बातें सुनकर बहुत कुछ समझा। और उससे भी ज़्यादा सोचा। काफी सोचा।  चीज़ों को टुकड़े टुकड़े में न समझकर उनको जोड़ने का प्रयास करता रहता हूँ। इस प्रयास में कुछ टुकड़े छूट जाते हैं ,  कुछ बिखर जाते है और कुछ जुड़ कर और बड़े टुकड़े में परिवर्तित हो जाते है, इसे मैं समझना कहता हूँ। ऐसा जब होता है बड़ा सुकून महसूस करता हूँ। मेरे पास शास्त्रीय ज्ञान बहुत कम है। इसलिए बहस नहीं कर सकता। आप इसे स्कॉलरशिप की कमी कह सकते हैं। मेरी समझ अपनी होती है जिसमें बेशक औरों का हाथ होता है। संवाद की भी बात ऐसी ही है। इसमें शास्त्रों का तो पता नहीं पर कृष्णमूर्ति जी जो कहते हैं मुझे ठीक लगता है। आधनिकता को सबसे पहले व्यस्वस्था के रूप में गाँधी जी की हिन्द स्वराज से समझ बनी। फिर प्रोफेसर A. K. Saran के लिखे से। कुमारस्वामी के बाद उनकी परंपरा में संभवतः सबसे विद्वान ही नहीं उससे बढ़के एक ऐसे व्यक्ति जिनको ज्ञान reveal हुआ हो, ऐसे थे सरन साहब। उनके मुताबिक आधुनिकता violent है, newness या novelty seeking है और rootless है या self grounded है। मैं उसमे एक दो चीज़ और जोड़ता हूँ। यह faithless है और छद्यमि है। जो दिखती है सत्य उसके उलट होता है।

पवन कुमार गुप्त
दिसंबर 27, 2019
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Wednesday, December 25, 2019

1750 में अंग्रेज़ और पश्चिम के अन्य आर्थिक इतिहासकारों के अनुसार भारतवर्ष दुनिया के कुल गैर कृषि उत्पाद का 24.5 से लेकर 33% उत्पादन करता था। यह लगभग निर्विवाद है। बहस 24.5 और 33 के बीच की है। Huntington की बहुचर्चित पुस्तक A Clash of Civilisation मैं 33% वाला आंकड़ा है। माने 1750 तक भी भारत एक समृद्ध देश था।

अब दूसरी बात यह उत्पादन कोई राजा महाराजा, कोई सेठ साहूकार अपने मातहत या अपने कारखानों में नहीं करवाते थे। अम्बानी या टाटा उस समय नहीं थे। तो यह लोहे, तांबे, चमड़ा, मसालों, और विशेषकर सूती और रेशमी भी, कपड़ों का इतना बड़ा उत्पादन कौन करता था? ये हमारी कारीगर जातियां करती थी। इसमे किसी को शक नहीं होना चाहिए।

ये उत्पादन इन कारीगर जाति के लोग अपने अपने घर बैठ कर करते थे। उनका कारखाना उनके घर पर ही होता था। घर के लोग, औरत, मर्द, बच्चे सभी उसमे अपनी अपनी भूमिका निभाते थे। वे अपनी मर्ज़ी और अपनी रफ्तार से उत्पादन करते थे। उन पर कोई बंदिश, ज़ोर ज़बरदस्ती का सवाल नही था।

अब जरा सोचा जाय कि यह कारीगर जातियाँ कौन सी थीं। जिन्हें आज हम पिछड़ी, backward , scheduled caste दलित जातियाँ कहते हैं, वे ये कारीगर जातियाँ थी और आज भी अगर हुनर और कारीगरी बची है तो इन्ही जातियों के पास मिलेगी।

अब जरा सोचा जाय अपनी सामान्य बुद्धि से की जिन जातियों की वजह से इस देश मे इतना बड़ा उत्पादन हो रहा हो और वे उत्पादन करता स्वतंत्र रूप से मालिकाना अंदाज़ में उत्पादन करते हों, उनकी हालत क्या उतनी दयनीय हो सकती है जैसा आज हमें दिखाया जाता है और हमने उसे मान भी लिया लगता है।

इस सुंदर, समृद्ध व्यवस्था को किसे नष्ट किया गया उसके लिए एक पुस्तक का नाम देना चाहूंगा। अंग्रेज़ ने लिखी है करीब 1940/35 के आस पास। The white sahib in India by Reginald Reynold. गांधी जी ने इन्हें अंगद का नाम दिया था। किताबें तो और भी हैं पर अंग्रेज़ की बात पर लोगों को ज़्यादा यकीन होता हो शायद इसलिए।

एक और बात। 1857 में सिर्फ लक्ष्मी बाई ही घोड़े पर सवार हो कर नही लड़ी। उमा देवी, उदा देवी, झलकारी बाई इत्यादि दसियों नाम है जिनका नाम कुछेक लोग ही जानते है और अंगेज़ इतिहासकारों ने अपने हिसाब से इतिहास लिखा। इन बहादुर महिलाओं का कोई जिक्र ही नही। और हमारे रोमिला जी, इरफान साहेब जैसों ने उसी अंग्रेज़ी नज़रिये से लगभग, चीज़ों को देखा तो हमे यह सब मालूम नही। हालांकि इन महिलाओं की एक आध मूर्तियाँ आज भी आपको लखनऊ और राय बरेली जैसी जगहों पर चौरस्तों पर मिल जाएगी पर  चूंकि ये घोड़े पर सवार, हाथ में ढाल तलवार लिए होती हैं लोग रानी झांसी समझ लेते है। पास जा कर नाम कौन पढ़ता है।

मजे की बात यह है कि ये बहादुर महिलाएं पिछड़ी और दलित जातियों से हैं। इसे संज्ञान में अच्छी तरह लेना चाहिए। और यह भी ज़रा सोचिये कि क्या किसी को घोड़े पर बैठना, बैठना ही नही उसे दौड़ा कर ढाल तलवार के साथ युद्ध करना क्या एक दो दिन में कोई सीख सकता है? खेल नहीं है। इसके लिए बरसों की मेहनत चाहिए ,अभ्यास चाहिए। यह बिना जातिगत परंपरा के सम्भव ही नही। इसका अर्थ हुआ कि इस प्रकार की परंपराएं इन तथाकथित पिछड़ी और दलित जातियों में रहीं होंगी।

तो सवाल उठना चाहिए कि जो तस्वीर भारत के बारे मे, हमारी इन परिश्रमी और बहादुर जातियों के बारे में गढ़ी गई है, हमे दिखाई गई है और हमने मान लिया है वह कहां तक सच है।

जिन लोगो की, जातियों के उद्द्यम से भारत समृद्ध था, जिन जातियों में उत्पादन का सामर्थ्य था, जिनकी लड़कियां घोड़े पर बैठ कर छोटो सेना का नेतृत्व करती थी, जहाँ ऐसी परंपराएं थी उन जातियों की क्या वैसी हालत हो सकती है जैसी हमे दिखाई जाती रही है और हमने मान लिया है। कम से कम उस तस्वीर पर प्रश्न यो खड़े होने चाहिए।

पवन कुमार गुप्त
दिसंबर 25, 2019
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भारतवर्ष में पढ़ाई लिखाई खास कर कालेज और यूनिवर्सिटी की और थोड़ी सी अंग्रेज़ी किताबे तथा अंग्रेज़ी फिल्मे और अंग्रेज़ी गाने सुनने , पढ़ने, देखने के बाद यहां का साधारण और 'पिछड़ा' आदमी सभ्य बन जाता है और अभिजात्य वर्ग में उसकी एंट्री के दरवाजे खुल जाते हैं।

और फिर अगर उस पर लेफ्ट और लिबरल और सेक्युलरिज़्म का मेकअप चढ़ जाय तो बल्ले बल्ले। यह सिलसिला कलकत्ते से होता हुआ, मद्रास से होता हुआ अब पूरे देश में फैल गया है। हर व्यक्ति 'विकसित' होने को उतावला है। अपने देसीपन को उतार कर अभिजात्य वर्ग में जाने को लालायित है। यह प्रक्रिया 1810 के करीब से लगातार चल रही है।

हिन्दू होने पर, मंदिर जाने पर, कोई पूजा अनुष्ठान करने में एक असहजता का होना, या शर्म आना, झेंप आना इसके लक्षण है।
नकलचिपन, दोगलापन, आत्म संकोच, अपने से घृणा इत्यादि इत्यादि अब हमारे स्वभाव का हिस्सा है।

देश में दो तबके हो गए है विशेषकर हिंदुओं में। एक साधारण एक अभिजात्य या अभिजात्य होने को आतुर कातुर। वर्तमान राजनै5 संघर्ष को इस नजरिए से देखने पर साफ होता है कौन इस बदलाव के पक्ष में है और कौन विरोध में

पवन कुमार गुप्त
दिसंबर 25, 2019
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Sunday, December 22, 2019

महात्मा गांधी और उसके बाद किसी बड़े नेता ने अंग्रेज़ी की खुलेआम खिलाफत की तो वे थे डॉक्टर लोहिया। अब तो जो अपने को उनका उत्तराधिकारी या चेला मानते हैं वे भी यह बात नहीं करते। गाँधी के चेलों (नकली, मठी इत्यादि कोई भी) का भी वही हाल है। हमारे बुद्धिजीवियों की तो बात ही छोड़िये। उनके बुद्धिजीवी होने की पहचान तो इस भाषा से भी जुड़ी है। हिंदी वालों का तो बुरा हाल है ही। भाजपा की रक बड़ी कमजोरी यह भी है कि उसमें अंग्रेज़ीदां नही के बराबर है। बेचारे ले दे कर जेटली थे वे सिधार गए।

अंग्रेज़ी सिर्फ भाषा नही है। दिमाग और विचारों को बनाने का एक बड़ा माध्यम भी है। यह मान लेना गलत होगा भाषा सिर्फ सम्प्रेषण का एक माध्यम भर है और value neutral होती है। नही। भाषा loaded होती है। उसका अपना स्वभाव, उसकी जीवन दृष्टि होती है जो निहित होती है। इसके अपने शब्दों के खास मायने होते है जो दूसरी भाषा में कभी कभी नही होते। हमारी भाषाओं में जो धर्म शब्द है उसका एक अर्थ religion हो सकता है। और भी कई सुंदर अर्थ हैं धर्म के। अंग्रेज़ी में वे अर्थ हैं ही नही। इस प्रकार के और भी उदाहरण हैं। freedom और स्वतंत्रता मैम भेद है।

हमारी बोली भाषाओं में सब कुछ होता है। अंग्रेज़ी में किया जाता है। हमारे यहां बिता हुआ भी कल है और आने वाला भी कल है। हम समय को अलग ढंग से देखते हैं। जल्दी में मोटे मोटे कुछ उदाहरण दे रहा हूँ। हमारा पूरा का पूरा समृद्ध परम्परिक लोक ज्ञान हमारी बोली भाषाओं के मुहावरों और कहावतों और लोके कथाओं में भरा पड़ा है। जीवन दृष्टि से लेकर मौसम, कृषि, स्वास्थ्य, भोजन, आचार व्यवहार की तमाम बातें।

पर हमारा आधुनिक भारत, 'लिबरल' और 'सेक्युलर' भारत इस सब से वंचित है और उसे पता भी नही है की उसकी दुनिया छोटी हो गई है। उसका शब्द कोष छोटा हो गया है इस अंग्रेज़ी के चक्कर में। उसके मां बाप, भले ही वे गंवई हो, उनकी शब्दो और मुहावरों और कहावतों की दुनिया इनसे बड़ी थी। हाँ अहंकार इनमे ज़्यादा है। अंग्रेज़ी की देन। अंग्रेज़ी की वजह से कई पत्रकारों की प्रतिष्ठा है। कई बुद्धिजीवी उसकी वजह से हैं।

हमने इस भाषा के चक्कर में सोचना छोड़ दिया है। हमारे नेताओं को इसकी फिक्र क्या समझ ही नहीं है। जो अंग्रेजीपरस्त है कांग्रेस और लेफ्ट दलों में कई मिल जाएंगे वे तो इसी की खाते हैं, वे क्यों सोचने लगे पर जो दूसरी तरह के देसी भाषा वाले हैं वे भी नहीं सोच रहे।

अंग्रेज़ी इस देश का नासूर है। मौलिक चिंतन इसे हटाये बिना सम्भव नही। विदेश से आई सोच और विचार और उससे हमारा दिमाग संचालित होते रहेगा जब तक अंग्रेज़ी की चलती रहेगी।

पवन कुमार गुप्त
दिसंबर 22, 2019
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जब गाँधी यह कहते हैं बिना धर्म की राजनीति मृतक शरीर के समान है तो उन लिब्रलों को, जो गाँधी के नाम को जब तब लेते रहते हैं, इसे भी समझना चाहिए। गाँधी यह भी कहते है कि उन्होंने धर्म का पाखण्ड देखा है और राजनीति में भी पाखण्ड देखा है पर राजनीति के पाखण्ड के सामने धर्म का पाखण्ड छोटा है। इन दोनों बातों का संज्ञान आज उन लोगों को लेना चाहिए जो देश को लेकर चिंतित हैं।

अगर पूरी तरह सामयिक समस्या पर ही अर्जुन की तरह आंख लगी रहेगी तो हम पेंडुलम की तरह झूलते रहेंगे। दृष्टि तो लंबी करनी पड़ेगी। देश की राजनैतिक मंच पर 70 साल से अधिक से चल रहे नाटक के पैटर्न को समझना भी ज़रूरी है। राजनैतिक खेल में आई सडाँध की तह तक जाना पड़ेगा। लोकतन्त्र नाम और लोगों को कैसे बेवकूफ बनाया जाए उसका पूरा विज्ञान अब कुछ लोगों ने पढ़ लिया है। शुरुआत कांग्रेस से हुई। इसके आर्किटेक्ट नेहरू थे। उसके बाद धीरे धीरे अन्य दलों ने भी उनसे सीख लिया। अब तो प्रोफेशनल और विशेषज्ञ मैदान में उतर आए है। पहले राजीव गांधी के समय विज्ञापन कंपनियां और उनके लोग यह काम करते थे। अब अमरीका की तरह यहां प्रशांत किशोर जैसे भाड़े पर बिकने वाले विशेषज्ञ आ गए है। कभी भजपा को सलाह देते है, कभी कांग्रेस को, कभी तृणमूल को और पुराने समाजवादी नीतीश ने तो उन्हें मंत्रिपद या उससे भी बड़ा कोई ओहदा दे दिया है। ये भाड़े के टट्टू अब राजनीति पर टिप्पणी भी करते हैं और मीडिया इन्हें बड़ी तवज्जो दी कर सुनता है।

यह हाल है हमारी राजनीति का, गाँधी जी के शब्दोँ में मृतक शरीर का। गाँधी जी का नाम नीतीश से लेकर ममता,और भाजपा भी लेती है और शायद प्रशांत किशोर भी लेता होगा। उनके टेम्पररी  आका नीतीश तो लेते ही हैं। गाँधी जी जब धर्म कहते है तो उनका अर्थ व्यक्तिगत और सार्वजनिक और सार्वभौमिक नैतिकता से है। नैतिकता जिसे आज की राजनीति और विशेषकर पीछले 70 वर्ष के लिबरल सोच ने जिसे ज़मीन के बहुत नीचे गाड़ दिया है। इस नई सोच का कोई पैंदा नही, कोई परंपरा नही। यह शुद्ध रूप से व्यक्तिवाद में विश्वास करती है, उसे प्रमोट करती है। इसमें फ्रीडम माने स्वच्छंदता को खुली छूट है। गाँधी के धर्म में नैतिकता है जो खुली छूट नहीं। वहां संयम है, स्वच्छंदता नही। लिबरल सोच में इन अंकुशों की कोई जगह नही।

इस देश को उबरना है तो राजनीति को नैतिकता से जोड़ने के उपाय ढूंढने होंगे।

अभी ध्रुवीकरण का दौर चल रहा है और दोनों ध्रुव पर बैठी शक्तियों के हक में है यह ध्रुवीकरण। इसमे किसी एक को दोष देना भूल होगी। पर हमें आंखे खोल कर देखने की ज़रूरत है और दोनों तरफ के ढोंग से अपनेको बचा कर नैतिकता का जीवन और राजनीति में समावेश कैसे हो इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है। पहले समझे फिर रास्ते भी निकलेंगे।

उपरोक्त लेख पुराने मित्र से लंबी चर्चा से प्रेरित है। ये मित्र वामपंथी विचार के रहे है पर गाँधी जी को भी खूब समझते है। वैसे नही जैसे गाँधी जी की संस्थाओं पर कब्जा जमाए लोग समझते है। देश के चंद खुले दिमाग और पैनी दृष्टि रखने वाले लोगों में से है ये मित्र। वाराणसी में रहते है। उन्हें धन्यवाद, नैतिकता वाली बात को खुलासा करने के लिए। लिबरल राजनीति में व्यक्तिगत मूल्यों की कोई जगह नही यहां तक तो मैं पहुंचा था। उन्होंने उसे आगे ले जाने में मदद की।

पवन कुमार गुप्त
दिसंबर 22, 2019
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Saturday, December 21, 2019

यह लड़ाई हिन्दू और मुसलमानों की बनाई जा रही है। कांग्रेस जो खेल, मुसलमानों को बेवक़ूफ़ बना कर, अपनी झोली में रखने का, वह खेल जो पिछले लगभग 70 वर्षों से खेला जा रहा है, वह एक बार फिर से खेला जा रहा है। इस बार कांग्रेस ही नहीं, उसी सीरत और उसी पैंतरे में दीक्षित हुए दूसरे दल मसलन तृणमूल के अपने अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है। इसलिए वे पूरी कोशिश करेंगे इस बार। इस बार सफल नही हुए तो मुश्किल हो जाएगी।

इतना ही नही दूर देशों में बैठा, खासकर पश्चिम का शाशक वर्ग, भी बहुत परेशान है। कांग्रेस और उन जैसी ताकतों को उनका पूरा सहयोग है। हिंदुस्तान में दलितों में ज़हर भरने और ईसाइयों के बड़े मिशनों के पीछे जो ताकतें देश के अंदर और बाहर बैठी हैं, वे भी अपनी पूरी शक्ति लगा रहीं है।

कांग्रेस अब इस देश के लिए एक कोढ़ बन गया है। जब तक इसका काम तमाम नहीं होगा देश पटरी पर नही आ सकता न ही bjp का विकल्प खड़ा हो सकता है। जो कि ज़रूरी है।

पवन कुमार गुप्त
दिसंबर 22, 2019
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लगता है आने वाले 20 वर्षों में जिन देशों में तथाकथित लोकतंत्र है - इस्लाम को मानने वाले देश , चीन, रूस, इत्यादि को छोड़ कर - वहां असली लड़ाई सेक्युलर, लिबरल राजनीति  से होगी। क्योंकि अभी इस आधुनिक विचारधारा का ठोस विकल्प निकाला नहीं है इसलिए इस बदलाव की प्रक्रिया में से ही कुछ निकलेगा।

दो बातें हैं। एक तो यह कि अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी से लेकर भारत तक के साधारण लोग आधुनिकता से और उससे निकली यह सेक्युलर लिबरल ढकोसले और फरेब की राजनीति से परेशान तो है और उसके प्रतिकार में कहीं ट्रम्प, कहीं जॉनसन, कहीं मकरों और कही मोदी के प्रयोग चल रहे हैं। महत्वपूर्ण ये लोग नही। महत्वपूर्ण यह हवा है जो पिछले 70/80 वर्षों  के ढकोसले और फरेब के खिलाफ चलनी शुरू हुई है। आधुनिक मुहावरों, फरेब भरे नारों और खोखले आधुनिक मूल्य जैसे समानता, लोकतन्त्र, समान अधिकार ,  इत्यादि इत्यादि से लोग थक गए हैं। उन्होंने देख लिया है कि यह सब कहने की बाते है। उल्लू बनाओ और राज करो यह है आधुनिक लोकतन्त्र। असलियत यह है। आधुनिक शास्त्र क्या कहते  है, वह अलग बात है। असलियत तो यही है जिसे साधारण आदमी कहीं महसूस करने लगा है पर उसके पास शब्द नही है इसके लिए। इसका इज़हार वह कभी क्लिंटन को हरा कर और कभी मोदी जी को जीता कर करता है। मुख्य बात है कि इस विचारधारा की पोल खुलने लगी है।

दूसरी बात यह है कि अभी भी दुनिया का तंत्र ही नहीं, इसको चलाने  वाली ताकते और दुनिया की असली कमान, इन सेक्युलर लिबरल शक्तियों के पास ही हैं। ट्रम्प भले ही राष्ट्रपति हों पर तंत्र की कमान उन्ही पुरानी शक्तियों के पास है। यहां भी ऐसा ही है। इसलिए चिदंबरमऔर पवार जैसों  का आप कुछ नही बिगाड़ सकते। सोनिया का भी नहीं। इनके हाथ मोदी शाह से कहीं बड़े हैं। मोदी शाह तो अभी बच्चे हैं इनके मुकाबले। मीडिया को मोदी शाह जो भी करते हैं वह तो साफ झलक जाता है। ये दूसरी शक्तियां तो बिना सामने आए आपना खेल खेल जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता। नेहरू के ज़माने से  rss और जनसंघ को हथियार बना कर मुसलमानों को डराया गया और कांग्रेस ने अपने को मुसलमानों और दलितों का रहनुमा बना कर पेश किया। कमाल की चाल चली। और आज फिर वही खेल खेला जा रहा है। इस manipulation के खेल में ये शक्तियां यहां भी और अमरीका में भी, माहिर हैं। ट्रम्प और मोदी ये इस खेल में अभी पके नहीं है।

एक और बात मोदी ट्रम्प जैसे लोगो की राजनीति भी उसी paradigm के अंदर है। ये उसी paradigm की गिरफ्त में है, उससे बाहर नही पर फिर भी ये लोग कही उस sophisticated माहैल में फिट नही बैठते। इसलिए ये एक प्रकार की चुनौती हैं , उस पुरानी खाई पी कर मोटी हुई आधुनिक सेक्युलर लिबरल व्यवस्था को। एक प्रक्रिया चल रही है। महत्वपूर्ण है।

ऊंट किस करबट बैठता है - इस पर निर्भर करता है कि यह फरेबी व्यवस्था और कितने दिन चलेगी। paradigm के अंदर युद्ध चल रहा है। लोग इस paradigm से उकता चुके है। विकल्प की तलाश है। मिल नहीं रहा पर कसमसाहट हो रही हैं। पुरानी शक्तियाँ परेशान है पर बहुत ताकत है अभी उनमे और वे पूरा जोर लगा रही हैं कि यथास्थिति बनी रहे। देखे क्या होता है। बुद्धिजीवी वर्ग पूरी तरह यथास्थिति में विश्वास रखता है। कृपाचार्य की संतानें!

पवन कुमार गुप्त
दिसंबर 21, 2019

Thursday, December 19, 2019

भारत का अभिजात्य वर्ग सिर्फ पैसे से निर्धारित नहीं होता। पैसा बहुत सारे घटकों में से सिर्फ एक है। बहुत सारे दिल्ली शहर के वे लोग जो झोला लेकर और चप्पल पहन कर बिखरे बाल या आजकल की फैशन के अनुसार चोटी और बेतरतीब दाढ़ी रखे हुए बावली सी मुद्रा, कभी गंभीर और चिंतनशील मुद्रा में घूमते पाए जाते है, वे भी इसी अभिजात्य वर्ग में से आते हैं।

आधुनिकता में अपने को ढाल लेना, देसीपन को उतार कर या तो फेंक देना जैसे सांप अपनी केंचुली फेंक देता है, या उस देसीपन को सेक्युलरिज़्म से धो कर या उसमें अपने को रंग कर शुद्ध कर लेना यह सबसे ज़रूरी संस्कार है अभिजात्य वर्ग में प्रवेश पाने के लिए। इन्होंने संत कबीर को भी सेक्युलर बना लिया है। आधुनिक होने के लिए अंग्रेज़ी के साथ एक दोस्ताना रिश्ता बहुत ज़रूरी है। और जब आप आधुनिकता अपनाते हैं तो ज़रूरी है कि आप अपने साधारण को ज़रा मूर्ख, कमतर, कमज़ोर, बेचारा, अशिक्षित, अज्ञानी, लाचार इत्यादि मानने लगे। कुल मिला कर आप श्रेष्ठ और वह साधारण बेचारा हो जाता है जिसके हक के लिए यदा कदा आप लड़ने का नाटक करते है और बहुत हुआ तो उसे अंग्रेज़ी पढ़ा कर, लड़ना (अपने अधिकारों के लिए) सीखा कर अपने जैसा बनाने का प्रयास करते हैं। इस अभिजात्य वर्ग की जड़े नही होती यह rootless होता है। यह अंतराष्ट्रीय नागरिक होता है जो विविधता की बाते बहुत करता है पर दुनिया एक जैसी बनाना चाहता है। इस जंतु को अपने विरोधाभास दिखाई नही पड़ते। यह अपने जीवन में मूल्यों की जगह नही के बराबर छोड़ता है पर सार्वजनिक मंचो पर मूल्यों की खूब दुहाई देता है, उनके लिए जीने मरने की बाते करता है। वह सार्वजनिक जीवन मे एकता, भाई चारे, सौहार्द की बाते करता पर निजी जीवन में उसे चरम सीमा की स्वतंत्रता चाहिए, परिवार में उसे किसी adjustment या compromise से बहुत मुश्किल होती है। पर ये विरोधाभास उसे दिखाई नही देते।

आधुनिक होने और अभिजात्य वर्ग में प्रवेश पाने के लिए उसे सेक्युलर और लिबरल होना ज़रूरी है।

भारत का खासकर दिल्ली का राजनीतिक नेतृत्व नेहरू के जमाने से अभिजात्य रहा है। बीच बीच में थोड़े बहुत दूसरी तरह के लोग आए पर कोई न कोई कारण से चल न सके। जैसे शास्त्री जी, चरण सिंह, राज नारायण जी, कामराज, देवी लाल इत्यादि पर ये ज़्यादा टिक न सके। ये आज वाले मोदी, अमित शाह इत्यादि भी इसी श्रेणी में आते है। बाजपेयी जी ने अपने को संवार कर अभिजात्यों मैं प्रवेश पा लिया था। अब वालों की मुश्किल है। रहा सहा अरुण जेटली जो उस वर्ग का था, वह भी चला गया।

वर्तमान लड़ाई विशेषकर जो सोशल मीडिया पर चल रही है caa का cab को लेकर उसका उपरोक्त से संबंध सुधि पाठक लगाएंगे ऐसी उम्मीद है।

यह हिन्दू मुसलमान की लड़ाई नही है। यह ढोंग के पर्दाफाश की लड़ाई के रूप में और भारत की 70 वर्ष की जड़ता को भी चुनौती है। किसकी जीत होगी, मालूम नही। पर फिर से अगर उनकी जीत हो गई जो 70 वर्षो से हिन्दुओर मुसलमान दोनों को बेवकूफ बना रहे हैं तो दुर्भाग्यपूर्ण होगा। अगर बाजी दूसरे मार ले गए तो उम्मीद है कि 4/6 वर्षोंमें नए राजनैतिक विकल्प निकलेंगे।

Wednesday, December 18, 2019

अपनी बोली में लिखने का मज़ा ही कुछ और है। कितनी सहजता अपने आप आ जाती है। अँग्रेजी ने कितना कबाड़ा किया है - दिमाग का, सोच का, दृष्टि का, सोचने के ढंग का - इसका मूल्यांकन होना अभी बहुत दूर की बात है। जो थोड़े से लोग और इनकी संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है, अपनी भाषा से दूर हो गए और अँग्रेजी को जबरन गले लगा लिया है वे न इधर के न उधर के वाली हालत में हैं। हम अँग्रेजी के चक्कर में अपने सुंदर और बड़े अर्थ खोटे जा रहे हैं। जैसे धर्म एक शब्द  जिसका अनुवाद अँग्रेजी में मेरे जैसे आदमी के लिए तो संभव नहीं। इसका अनुवाद religion करना महा मूर्खता है, पर यह मूर्खता हमारा पढ़ा लिखा पर अशिक्षित समाज करे जा रहा है। इसी प्रकार एक और सुंदर शब्द स्वतन्त्रता है जिसका अनुवाद अङ्ग्रेज़ी में हो ही नहीं सकता पर हम मूर्खता में freedom, independence इत्यादि करते जाते हैं। इसी तरह के तमाम शब्द सिर्फ हिन्दी ही नहीं हमारी भाषाओं और बोलियों में हैं जिनके अर्थ सुंदर भी हैं, वास्तविकता के ज़्यादा नजदीक भी हैं और हमारे स्वभाव के अनुकूल भी हैं। पर हमने मान लिया है की अङ्ग्रेज़ी ऊंची भाषा है और जो हमारे पास है वह तो उसमे होगा ही और शायद हमसे ज़्यादा ही होगा।

पढ़ा लिखे हिन्दुस्तानी से ज़्यादा आत्म-संकोची (self conscious) शायद ही कोई और मनुष्य प्रजाती हो। वह अपने को और अपने समाज को, देश को, अपनी नज़र से देखता ही नहीं। हमेशा दूसरों की नज़र से। हमने अपनी सहजता खो दी है। हम जाने-अनजाने नकलची हो गए हैं। एक अजीबो-गरीब हालत हो गई है हमारे पढे लिखे की। नेहरू जी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बाध्य सा कर दिया की औपचारिक आयोजनों पर धोती न पहन कर शेरवानी और चूस्त पाजामा पहने। हमे सोचना चाहिए इसके पीछे क्या मानसिकता काम कर रही थी। और यह कितनी गहरी बैठी हमारे अंदर की उनके विपक्ष वाले मसलन मोदी जी ने भी उस मानसिकता को अनजाने ही सही, गले लगा लिया। कभी कभी, नहीं शायद बहुदा, छोटी छोटी बातों मे बड़े मसले छुपे होते हैं। जो समाज सहज नहीं होता - और यह बात हरेक पर भी लागू होती है - वह नकलची हो जाता है और उसे पता भी नहीं चलता। वह कृत्रिमता में जीता है, मौलिकता खो देता है। हमारा पढ़ा लिखा समाज TV अंकरों से लेकर हमारे राज नेता सभी दलों के (राहुल गांधी, मोदी जी, जेटली, सिंधिया, पासवान के बेटे हो या मुलायम के) हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी तकरीबन सभी ऐसे ही हो गए हैं। फर्क बहुत सतही है। इसलिए भी भाजपा और कांग्रेस की लड़ाई बेबुनियाद मानता हूँ। जे एन यू का विवाद भी। मसला कुछ और है जहां ध्यान जाने मे न जाने कितना वक्त लगेगा।

Tuesday, December 17, 2019

देश सदियों से घायल है। घायल हिन्दू, सिख, जैन, बोद्ध तो हुए ही हैं, यहां का  95 प्रतिशत मुसलमान और यहां का क्रिस्तान भी कभी न कभी घायल हुए हैं। मानसिक रूप से घायल, मनोवैज्ञानिक स्तर पर घायल। पहले मुसलमानों के राज में भय से आक्रांत रहे। डरे डरे, अपने को समेटे हुए। यह सिर्फ हिन्दू और गैर मुस्लिमों की बात ही नहीं है। जो धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बने उनमे भी डर रहा होगा। हिंदुस्तान का व्यापक समाज भय ग्रस्त हुआ। नालंदा जब जला होगा या और उसी तरह की घटनाएं हुई होंगी, या जब जब जजिया लगा होगा, या गुरु रामराय या गुरु गोविंद सिंह केसाथ जो जो घटा वह घटा होगा और उसकी खबरे व्यापक समाज तक पहुंची होंगी तो समस्त समाज, मुसलमान समेत आक्रांत तो हुआ होगा। सदियों भय में जीने की आदत भले ही पड़ जाय पर वह घायल तो कर देता है। न तो मैं इतिहासविद की हैसियत से और न ही कोई सामाजिक मनोवैज्ञानिक की हैसियत से कहने की legitimacy रखता हूँ जो आजकल के specilisation के ज़माने में बहुत ज़रूरी मान लिया गया है, परन्तु एक सामान्य बुद्धि और चेतना के आधार पर यह कह रहा हूँ। पाठक अपना अनुमान बगैर किसी पूर्वाग्रह के लगाए की बात सही लगती है या नही। हम पुराने को इतनी आसानी से छोड़ नही पाते। उसका असर मन और दिमाग दोनों पर होताहै और लंबा चलता है। उसकी अवहेलना उसका इलाज नहीँ।

इसके बाद अंगेज़ों का काल। उन्होंने तो डराया भी, भयभीत भी किया, जबरदस्त हिंसा की और साथ ही हीनता का भाव भी दे गए।   अपनी भाषा, पहनावा, रहन सहन, रीति रिवाज सभी को हीन बना गए। यह दूसरा बड़ा घाव। पहले भय, ऊपर से हीनता। सोने में सुहागा। किसी ने कभी कहा था सोनिया गांधी अगर काली चमड़ी की होती तो क्या वह इतने वर्ष कांग्रेस की अध्यक्षा रह सकती थी? सोचने का मुद्दा है।

ज्योति बाबू, साम्यवादियों में ऊंचा नाम। वे अपनी गर्मियों की छुट्टियाँ लन्दन में उद्योगपति स्वराज पाल की मेजबानी में बिताते थे। सोचना चाहिए इन बातों का हमारे घायल मन और दिमाग से कोई सरोकार है या नही?

मेरा मानना है इस देश का सबसे बड़ा मसला यह घाव है। इसे नॉइपाल साहब ने थे wounded civisation नाम से संबोधित किया। इस घाव का इलाज ज़रूरी है। लीपा पोती से नही होगा। हमारी तथा कथित हस्तियां - फिल्मों वाली, लेखकों और शायरों वाली जमात, और तथाकथित बुद्धिजीवियों की जमात - इनको एक  हद तक सफलता (लोकप्रियता) तो मिल गई है पर इसका यह मतलब नही निकालना चाहिए कि इनका घाव भर गया है। नही इन्होंने घाव को छुपाने की तरकीब (makeup से) निकाल ली है। बस।

इसका इलाज अगर किसी के पास है तो घायल 'साधारण' के पास ही है। 'साधारण' को ही संकोच दूर करके - नेताओं, बुद्धिजीवियों, पंडों और मुल्लों  और तथाकथित 'हस्तियों' से/के प्रभाव से अपने को मुक्त करके पहल लेनी होगी। याद रहे गाँधी जी इस  'साधारण' को बहुत ऊँचा मानते थे, सम्मान करते थे (झूठा सम्मान, बनावटी नही) और उनसे सीखते थे।
कुछ कर नही सकते तो जो मज़ाक चल रहा है उसका मज़ा ही ले। प्रशांत किशोर की बड़ी चर्चा है। सुनते हैं पहले मोदी जी को चुनाव जिताया। जीतने के बाद ज़्यादा तवज्जो नहीं दी तो किशोर जी ने आम आदमी को चुनाव जितवा दिया फिर नितीश और लालू जी को बिहार में और अब कांग्रेस के चिरंजीवी उनसे बात कर रहे है पंजाब और यू पी के चुनाव के लिए। इस सबके बीच नितीश जी ने उन्हे अपनी सरकार मे काबीना मंत्री सरीखा रुतवा भी दे रखा है। प्रशांत जी कई दलों से एक साथ सौदा कर सकते है, काबीना मंत्री का रुतबा भी एक राज्य में रख सकते है। और चुनाव तो जित्वा ही देते है, तभी तो सबको  उनकी इतनी पूछ है। कोई जादूगर से कम तो नहीं होंगे। जे एन यू के होनहार उभरते नेता कन्हैया ने मोदी जी को जादूगर की उपमा दी - ठीक हे है। अब प्रशांत किशोर तो उससे भी बड़े जादूगर निकले। जिसे चाहे चुनाव जीता दे।

मैं भी सोचता हूँ क्या हम सोचने को स्वतंत्र हैं? हमे लगता तो है की सोचने में क्या है। कम से कम सोचने पर तो कोई नियंत्रण नहीं है। पर यह कितना सच है?  sigmund freud के एक भतीजे हुए जिनका नाम था edward bernays। अमरीकी राष्ट्रपति फ़्रेंकलिन रूसवेल्ट जिनहोने आधुनिक अमरीका को दुनिया का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया, जिनके कार्यकाल में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं जैसे विश्व बैंक, यू एन, आई एम एफ इत्यादि बनाई गई (सब अमरीका के नेतृत्व में) दुनिया को अपने (अमरीका के) मुताबिक चलाने के लिए ने bernays को लोगों की सोच को सरकार के अनुसार ढालने के लिए नियुक्त किया और खूब अच्छा इस्तेमाल किया।

लोगों को लगता है की वे सोचते हैं पर उन्हे सुचवाया जाता है। प्रशांत जी भी कुछ वैसा हे कर रहे है। जय हो लोक तंत्र की!
हम लोगों में, विशेषकर मध्यम वर्ग और उससे ऊपर वाले तबके में, एक अजीब तरह का बनावटीपीना, एक असहजता आ गयी है। हम सहजता खो चुके हैं। हर व्यक्ति जो है, उससे अलग कुछ प्रदर्शित करता है।
कुछ 20 वर्ष पहले मसूरी के अंग्रेज़ी स्कूलों के बच्चों का इंटरव्यू किया था। एक तरफ वे स्कूल थे जहां देश के बड़े और छोटे शहरों के मटेरिअलिस्म की दौड़ में लगे लोगों के बच्चे पढ़ते हैं। दूसरी तरफ वुडस्टॉक स्कूल के बच्चे जो विदेश में रहते वे पढते थे। इन दोनों तरह के बच्चों में एक बड़ा फर्क दिखा। वुड स्कूलके बच्चे सहज थे भले ही थोड़े बदतमीज़ ज़रूर थे। पर जो थे, वे थे यानी उनमे बनावटीपना नहीं था। दूसरे स्कूलों के बच्चों में सहजता नहीं एक बनावटीपन था। वे या तो शर्मालू थे या "स्मार्ट' दिखाने की चेष्टा करते पाए गए।

कल एक दूर के रिश्तेदार परिवार जो पिछले लगभग 50 बर्षो से विलायत में रहते है। एडिनबर्ग में। डॉक्टर हैं। वे थे और उनकी दो बड़ी उम्र की लड़कियां। एक लड़की का पति भी था - मूलतः बँग्लादेसी। अच्छा खासा समृद्ध परिवार। पर उनसे बात करके, उनकी सरलता, सहजता देख कर अपने देश के उसी तबके के लोगों से तुलना करने से अपने को बचा न सका। और इस तुलना ने मन को दुखी ही किया। कहाँ चली गई हमारी सहजता? क्या सहजता और आत्मविश्वास में संबंध है?
राजनैतिक माहौल तो ऐसा हो गया है कि आप कोई सहज बात कर ही नही सकते। पढ़ने के पहले ही लोग दो ध्रुवों में से किसी  एक में पहले डालेंगे और पढ़ेंगे बाद में। यह होड़ सिर्फ नेताओं में नहीं, मीडिया में ही नहीं, जो भी अपने को सोचने समझने वाले तबके में रखता है, उनमे भी है कि वह यह जताए/ दिखाए कि वह कितना बड़ा सेक्युलर है।

पर यह पाखण्ड तो हमे ले डूबेगा। महात्मा गाँधी का नाम लेते हैं पर उनको पढ़ तो लीजिये पहले। वे तो इस तरह के छिछले सेक्युलर नहीं थे - मेरी छोटी सी बुद्धि के अनुसार। थोड़ा बहुत पाखण्ड तो आधुनिक दुनिया में चलता ही है पर इस पिछले 30-35 वर्षों की लिबरल राजनीति ने इसे इस कदर बढ़ा दिया है कि व्यक्ति अपने से ही दूर होता जा रहा है। अंदर कुछ और बाहर कुछ। बाहर मूल्य और सिद्धांतों की बातें और अंदर - सबको पता पता है !
1815 में विलियम बेंटिक भारत का अंग्रेज़ गवर्नर जनरल यह लिखता है की 'अब हमे डरने की ज़रूरत नहीं क्योंकि भारत का पढ़ा लिखा वर्ग अपनी परम्पराएँ जैसे दान-दक्षिणा देना बंद करके अपने को हमारे जैसा बनाने में  लग गया है" । भारत को हीनता से ग्रसित किया गया। उसे यह समझाया गया की तुम्हारी परम्पराएँ, तुम्हारी जीवन शैली, तुम्हारी मान्यताएँ, तुम्हारे रीति-रिवाज, तुम्हारे तरीके - सब पिछड़े है, दक़ियानूसी है, उनमे अंध-विश्वास है, इत्यादि इत्यादि।

यह सिलसिला 19वीं से आज तक चल रहा है। अब तो पढ़ा लिखा वर्ग अपनी बोली भाषा भी भूल गया है। बेंटिक या उसके जैसे लोग, जो अब हमारी कौम में भी पैदा हो गए हैं, शब्दों और मुहावरों का बड़ी चालाकी से उपयोग करते हैं, (दूसरे के) दिमाग को नियंत्रित करने के लिए। 1949 में अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन नें बड़ी चालाकी  से development या विकास शब्द का इस्तेमाल किया। उसके पहले विकास शब्द तो था पर किसी पिछलग्गू के साथ इस्तेमाल होता था जैसे - मानसिक विकास, आध्यात्मिक विकास, शारीरिक विकास, आर्थिक विकास, इत्यादि इत्यादि। उसे दिन से विकास का अर्थ एक ही हो गया। जैसा अमरीका है, वैसा बनाना विकास है!।

तो शब्दों से दिमागो के सोचने के ढंग को नियंत्रित किए जाने की कला विकसित की गई। इसका न्यूनतम उदाहरण है "भक्त"। आजकल देश में इस शब्द को एक तरफ गाली के रूप में लोग उपयोग करने लगे हैं और दूसरी उसे भाजपा को अगर आप समर्थन दें, तो उनपर चिपका दिया जाता है। अगर आप कांग्रेस या तृणमूल या और किसी दल के समर्थक हैं तो आप "भक्त" नहीं आप rationalist है। और rationalist होना तो scientific होना है, modern होना है। भक्त होना तो दक़ियानूसी है, पिछड़ापन है।

हमे इस फरेब और इस चालाकी को समझना चाहिए।

दूसरी बात 'भक्त' और 'भक्ति' को हमारी परंपरा में ऊंचा स्थान दिया गया है और है भी। अब ये लोग इसे भी बदनाम करने में लगे हैं। भाजपा का  मसला तो एक बात। पर यह भक्त और भक्ति को क्यों बदनाम किया जा रहा है। इसका प्रतीकार होना चाहिए।
महात्मा गांधी को न निगलते बनता है और न ही बाहर किया जा सकता है। देश के राजनैतिक नेतृत्व बायें से दाये तक, बंगाल और केरल से लेकर नागपुर तक, जेएनयू सेलेकर बीएचयू तक यही हालत है। देश की संसद जहां महात्मा को ले कर हुआँ हुआँ करते सांसदों का यदि सर्वे किया जाय तो मेरा अनुमान है कि अधिकांश 90% ने गांधी जी का लिखा या बोला शायद ही कुछ पढ़ा हो। हिन्द स्वराज का नाम भी पता न हो, शायद। जिन लोगों को कोई भारतीय भाषा के 1500 से 2000 शब्दों से ज़्यादा नहीं आते उन्हें गांधी जी का ज्ञान हो मानना मुश्किल है। मज़ाक चलता है देश में। खुलेआम झूठ और फरेब चल रहा है। एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने के और कोई काम रह नही गया है।
मुसलमानों में खौफ पैदा करके उन्हे वोट के लिए अपनी तरफ करना - यह कांग्रेस की पुरानी साजिश रही है। नेहरू के जमाने से। 1952 के चुनाव के बाद पहली लोक सभा में 2 मुस्लिम लीगी जीते थे (वह दल जो पाकिस्तान को धर्म के आधार पर मांग कर रहा था) और 7 या 8 लोग जनसंघ, राम राज्य पार्टी और हिन्दू महासभा से जीत कर आए थे। नेहरू ने अपनी प्रैस कोन्फ्रेंस में कुछ इस तरह कहा कि जिससे आशय यह गया कि मुस्लिम लीगियों से हिन्दू को ज़्यादा भय करने की ज़रूरत नहीं है। भय तो यहाँ के मुसलमानों को इन दलों से करना चाहिए और मुसलमानों को कोई बचा सकता है तो वह सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही है।

कांग्रेस की इस बात को, इस रणनीति को कोई समझ पाया तो वे लोहिया थे। 1963 में उत्तर प्रदेश मे तीन उपचुनान हुए लोहिया, कृपलानी जी और दीन दयाल उपाध्याय (जन संघ) इनमे खड़े हुए और तीनों ही जीते। कांग्रेस तीनों जगह से हारी। यह भी याद दिलाना चाहूँगा कि '66 से '67 के बीच तीन लोग जो कांग्रेस के बाद के हुक्मरानों (नेहरू - इन्दिरा परिवार) को चुनौती  दे सकते थे - लोहिया, दीन दयाल उपाध्याय और लाल बहादुर शास्त्री जी - तीनों की हत्या हुई।

अपने चुनाव की जब लोहिया घोषणा कर रहे थे तब उनकी प्रेस कान्फ्रेंस का एक अंश यहाँ ज्यों का त्यों दिया जा रहा है।

Lohia Press release, Delhi, May 2, 63: The high stakes involved in the by-elections became slowly evident to him. ‘I know that nothing short of a people’s soul is at stake. He thought it can make or unmake the government. ‘The war with China clearly has proved that India is burdened with government of inefficiency, arrogance and national shame. Humiliating defeats at the hands of China have made this government more brazen still and not the slightest evidence is there of that remorse which is a first step to correction of old errors. Success at the bye-elections would transport the government from arrogant inefficiency into lunatic arrogance. That is why it s necessary for the people to save its soul and to accept policies of a joint end to capitalist and bureaucratic exploitation, pricing so that necessities sell at no more than one-a-half times their costs of production and farm produce fluctuations do not go beyond sixteen percent in any single harvest, immediate abolition of English as medium, preferential opportunities for backward groups, sacred guarding of frontiers and true non-alignment in place of alternative service that splits the nation…As the contest has progressed, I am seized above all by the implications of these bye-elections to the Hindu-Muslim question. I had indeed known that, to the Congress party the Indian is only a voter and all manipulating of caste, language and religion are permitted. I had also known that this party had inherited for internal use the British
maxim of divide and rule. But i had not known the extent to which this crime could go. Undoubtedly, the JS and Muslims have been separated by walls of misunderstanding and suspicion. What the Congress party does is to fortify these walls and raise them highest. This strengthens the Congress voting position and darkens the JS and Muslim minds further. …The violence and wholly unmerited attack of congress propagandists on me has revealed the whole situation to me as under a flood light. I am sized with the passion to dissolve these suspicions, to lower these walls of understanding, if we are unable at the first shot to abolish them. Should the Congress suffer defeat at all the three bye-elections, i am convinced that this would somewhat cleanse the JS and Muslim minds towards each other. I will do what i can to promote the glory; for their and similar developments on the other side of the frontier may pave the way to an Indo-Pak confederacy. I am going to Amroha and Janupur in an effort to communicate my passion to the electorate. I hope that all forces of good-will, secularity, humanism and national integration will share in the effort.’
(The report was found in Madhu Limaye papers, kept at Teen Murti, in its manuscript section. Many of the private paper collections have remained unsorted and uncatalogued at Teen Murti and because of which they are unavailable to researchers, which is one reason why jaundiced opinions are brandished about the Indian history.)

जो लोग देश को लेकर गंभीर हैं, उनसे निवेदन है इसको ध्यान से पढे। लोहिया यह कह रहे हैं कि मुसलमानों और जनसंघ (आज की भाजपा) के बीच संदेह भरा गया है, कांग्रेस के द्वारा और वह इस संदेह की दीवार को कम करने के लिए, देश हित में, काम करेंगे।

आज भी हमे यह समझना अत्यंत आवश्यक है। आज कांग्रेस ही नहीं तृणमूल समेत अनेक दल उसी श्रेणी में आ गए हैं।
अभी अभी ब्रितानिया में चुनाव हुए। वहाँ भी वही हुआ जो दुनिया के अधिकतर लोकतान्त्रिक मुल्कों में पिछले 5-7 वर्षों में तेजी से हो रहा है। लेफ्ट, सेक्युलर लिबरल दल हर जगह हार रहे हैं। इस हवा को समझने की ज़रूरत है। सबसे ज़रूरी उनके लिए है जो इस विचारधारा के समर्थक हैं, जिसमे मैं भी एक हद तक अपने को पाता हूँ।

लिबरलिस्म में जो एक बड़ा विकार आ गया है वह है दोगलेपन का।

निजी जीवन में कोई मूल्य होने की ज़रूरत नहीं, मूल्यों की बातें सिर्फ सार्वजनिक जीवन में की जाएंगी। आज से 50-60 वर्ष पहले जो लोग लेफ्ट पॉलिटिक्स से इत्तेफाक रखते थे, उनके निजी जीवन में भी मूल्य दिखाई देते थे। अब ऐसा होना कतई ज़रूरी नहीं। नाम लेना ठीक नहीं होगा पर  हमारे अखबारों और टीवी चनेलों के बड़े नामों, फिल्मी दुनिया के लेफ्ट लिबरल, संसद में बैठे कई सांसदों, नए समाजवादियों इत्यादि कहीं भी नज़र दौड़ायें - आपको मेरे बात समझ आ जाएगी।  कर्पूरी ठाकुर, किशन पटनायक, रबी राय, का जीवन देखें और आज के मुलायम सिंह या लालू के परिवार के सदस्यों को देखे जो अपने को समाजवादी कहते हैं।

दूसरा दोगलापन है धर्म को लेकर। पहले के लेफ्ट पॉलिटिक्स वाले लोग ज़्यादातर नास्तिक (aethist या agnostic) की श्रेणी में आते थे। घर के अंदर भी और बाहर भी। अब ऐसा नहीं। घर के अंदर आस्तिक और बाहर नास्तिकता का ढोंग।

बाहर गरीबों की बातें और खुद का जीवन, जीवन शैली और यारी दोस्ती अमीरों के साथ। इस तरह के तमाम विरोधाभास नए लिबरल सेक्युलर जमात में आ गए हैं। जिस तरह की राजनीति पिछले 40/50/60 वर्षों में दुनिया में हावी है, विशेषकर पुराने सोवियत रूस के टूटने के बाद, उसमे इस तबके को बहुत से राजनैतिक लाभ भी मिले।

इस दौरान NGO की दुनिया खूब बढ़ी। उसे बढ़ाने में, प्रोत्साहित करने में भी उन शक्तियों का (विशेषकर अमरीकी establishment और वहाँ की अकादमिक दुनिया) हाथ रहा। NGO के अलावा यहाँ की मीडिया और activist तबके को भी इनही शक्तियों ने खूब प्रोत्साहित किया। प्रोत्साहित ही नहीं किया अपने दोगले चरित्र के रंग में भी रंग कर  इन्हे बर्बाद कर दिया।

अब दुनिया के साधारण लोग इस फरेब को समझने लगे हैं। इस समझ की प्रक्रिया कुछ वैसी ही है जैसे एक बच्चा अपने घर, माँ-बाप के झूठ और फरेब को समझता है। यह प्रक्रिया हम और आप बड़े  होने पर जैसे समझते हैं उससे अलग है।
दिल्ली जैसे शहर में, iic जैसी जगहों पर जहां मीडिया और तथाकथित बुद्धूजीवी बैठते उठते हैं वहां धोती, टोपी या पुरानी स्टाइल की चोटी (नई स्टाइल वाली चोटी नहीं, जिसका फैशन चला हुआ है) पहने हुए आदमी को कैसा लगेगा। वह कोई धर्माचार्य न हो तो, उसे कैसा लगेगा। मेरा ख्याल है - अटपटा। मन मे आता होगा धोती छोड़ कर, टोपी उतार कर पतलून और कमीज पहन लें और पुरानी स्टाइल की चोटी को नए अंदाज में बदल दे। शायद ऐसा होता होगा। मैं तो कल्पना ही कर सकता हूँ क्योंकि अपन तो शुरू से नए अंदाज मेदीक्षित हो गए थे।

तो आजकल फेसबुक पर मेरा भी कुछ कुछ यही हाल है। मुझे अपनी बुद्धि और विवेक और दृष्टि पर शंका होने लगी है। लगता है मैं समझदारों के बीच में बेवकूफ हूँ। बगुलों के बीच कौवा। अपने को विरोध समझ नही आ रहा भाई। और मैं भाजपाई भी नहीं।
किसी भी व्यक्ति हो या मुद्दा - उसका समर्थन करना और विरोध करना, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ही स्थिति में आप, व्यक्ति या  मुद्दे को, तवज्जो दे रहे होते हैं, ध्यान दे रहे होते हैं।

विरोध का सबसे कारगर तरीका है - अवहेलना। न समर्थन, न विरोध। ध्यान ही नही देना। असहयोग। मौन असहयोग। इसमे जिसकी अवहेलना होगी वह कुछ समय बाद तिलमिला जाएगा। इस छली और भ्रामक व्यवस्था के साथ ऐसा ही कुछ करना होगा। पानी सर के ऊपर आ चुका है
बहुत वर्ष पहले टीवी पर एक विज्ञापन आता था sanitary napkin का। छोटे कस्बे की लड़कियाँ इसका इस्तेमाल करें, बड़े शहरों में तो होता ही है, इसका प्रयास था। उसमें लड़कियां कहती हैं " अब हम भी modern हो गए हैं". यह tag line थी जिसके basis पर इसका प्रचार किया जा रहा था। modern।

यह modern होने की, प्रोग्रेसिव होने की। नहीं नही गलत कह गया होने कीं नहीं। दिखने की। modern दिखने की। प्रोग्रेसिव दिखने की, activist type दिखने कीआंदोलनकारी , विरोध जताने की, लोकतांत्रिक मूल्यों कीसमझ और उनके हक में बोलने की यह फैशन है या सच्चाई है। मैं जब बारीकी से देखता हूँ तो संदेह होने लगता है। फ़ैशन सिर्फ कपड़ो और श्रृंगार का ही नहीं होता। और फैशन का सेंस पढ़े लिखे में बहुत sharp होता है।
गैर सेक्युलरिस्ट, गैर लिबरल, गैर rss सुर गैर मुलिम लीगियों के, और दलगत राजनैतिक नेताओं को दूर रखकर हिन्दू और मुसलमानों को साथ बैठ कर एक दूसरे का दर्द, दुख और गुस्सा समझने का प्रयास होना चाहिए। इसके प्रयास होने मुनासिब हैं। एक सिलसिला चले। गंभीरता से यह सिलसिला अगर चलाया जय तो साल भर में परिणाम, अच्छे परिणाम आने शुरू हो जाएंगे।

लल्लो चप्पो से दूर, साफ साफ बाते हों, एक दूसरे को समझने की कोशिश हो। सहमति या असहमति बाद की बात है। पहले एक दूसरे को समझा तो जाय।
1947 में आज़ादी के बाद दो मसलों को तो ध्यान में रखना ही होगा। सिर्फ सेक्युलरिज़्म की दुहाई देने से कुछ होने वाला नहीं है। एक कि जो मुस्लिम लीग पाकिस्तान धर्म के आधार पर बनने के समर्थक थे, उनके बहुत से समर्थक हिन्दुतान में रह गए। और शायद अभी भी हों। दूसरा इस्लामी brotherhood उस समय शायद अपने उस उभार पर नही पहुंचा था जैसे पिछले 2 एक दशक में। इन दोनों बातों को ध्यान में रखना जरूरीहै हिन्दू मुसलमान के प्रश्न पर बात करते वक्त।
हमारे मित्रगण संविधान को बहुत ऊंचा स्थान देते हैं। देना भी चाहिए। आधुनिक राष्ट्र राज्य व्यवस्था उसी के सहारे चलती है।

पर ये मित्र गाँधी जी का नज़्म भी बड़ी श्रद्धा और भक्ति से लेते हैं। एक किस्सा याद आ गया। चम्पारण मैं धारा 144 लगी थी। गाँन्धी जी को पकड़ कर कोर्ट में पेश किया गया। जज साहब ने पूछा mr. Gandhi do you plead guilty?". गाँधी जी का जवाब था "yes my lord. I am guilty. और फिर थोड़ा सा रुक कर बोले और यह बहुत महत्वपूर्ण है। वे बोले "But according to your law.".

इसके बाद उन्होंने अपनी बात रखी। अपने को कानून जो मानव द्वारा बनाया गया है, जो बार बार बदलता रहता है (हमारे कानून में अब तक कितने संशोधन हुए हैं, उसे देख लिया जाय), जो समय के साथ और स्थान के साथ बदलते रहता है, गाँधी जी ने ऐसा कह कर (But according to your law) एक झटके में अपने को कानून की चाहिरदिवारी से बाहिर कर लिया। फिर उन्होंने अपनी अंतरात्मा, विधान (संविधान से अलग) को आधार बना कर अपनी बात रखी।

अंत में उन्होंने जज साहब को दो विकल्प दिए। इन्होंने कहा "अब आपके पास दो विकल्प हैं। या तो अपने कानून के अनुसार मुझे कड़ी से कड़ी सजा दे। या फिर यदि आप मेरी बात से सहमत है तो वो गद्दी (पद) छोड़ कर मेरे साथ खड़े हों".

संविधान और विधान में यह जो फर्क है उसे हमे भी ध्यान तो रखना चाहिए। विधान सनातन होता है। अस्तित्व में जो व्यवस्था है जिसे हम और आप बदल नही सकते। जो हर समय और हर स्थान में एक जैसा रहता है। वह विधान। वह सर्वोपरि है। माने न माने आपकी मर्जी। गाँन्धी से मानते थे और संविधान से ऊपर मानते थे। बस इतना ही।
अभी नेट पर थोड़ा देख रहा था। अमरीका, दक्षिण अफ्रीका में भी बहुत अधिक संख्या में रेप होते हैं। अमरीका में तो नामी गरामी यूनिवर्सिटी जैसे हार्वर्ड इत्यादि में जो पुराने आल्फा बीटा गामा नाम के जो क्लब होते हैं जहां बड़े पैसे वाले परिवार कर बच्चों को ही अधिकतर लिया जाता है, वहां रेप होना आम बात होती है।

रेप से अधिक जघन्य अपराध शायद ही ओर कोई हो। इसकी जितनी भर्त्सना की जाय कम है। पर मेरी एक मुश्किल है। भारत मे अगर रेप होता है तो मीडिया उसे ऐसे प्रस्तुत करता है जैसे हमारे लोग, हमारा समाज (जो अब थोड़ा बहुत दूर दराज के गांवों में बचा हो तो हो। बाकी समाज तो सिर्फ कहने की बात है, बचा नहीं) सड़ा हुआ है। जैसे की रेप भारतीय समाज मे व्याप्त हो। यहां का रेप एक social evil एक सामाजिक बुराई और अमरीका का रेप एक individual का crime। यह दोगलापन या दिवालियापन - इसे क्या कहा जाय? इस रोग से हम पढ़े लिखे, मीडिया की देखा देखी सभी ग्रस्त हो गए हैं। रेप को condemn कीजिये। करना ही चाहिए। लड़को को लड़कियों के प्रति संवेदनशील बनाइये। उन्हें तहजीब सिखाइये, मर्यादाएं सिखाइये। पर यहां के रेप को social evil बना कर इस रोग को एक प्रकार की स्वीकृति दे रहे है और यहां का मनोबल जो पहले से ही कुचला हुआ है वह और धरातल में पहुंच जाएगा।
गहलोत साहब ने राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के सामने अभी अभी जोधपुर में, साफ साफ कह दिया कि राजनैतिक दलों का काम काले धन से चलता है। उनका ज़ोर भले ही इस सरकार द्वारा चलाये गये बांड की तरफ हो पर यह बात भी उन्होंने साफ तरह रखी की आज की राजनीति बिना दो नम्बर के पैसे के सम्भव नहीं।

अब इस बात को कौन आगे बढ़ाएगा? हमाम में तो सब नंगे हैं। गहलोत साहब भी होंगे। यह मामला नया नहीं है। और बेचारी जनता -जिसके लिए यह सारा प्रपंच चल रहा है, वह सब जानती है। पर करे क्या? नेतागण, उनके चेले चपाटी, कार्यकर्ता भी जानते हैं। नेता (कुछ 5 -10% जो अच्छे लोग होंगे) से लेकर सामान्य आदमी तक , सब लाचार है। क्या ऐसे ही चलता रहेगी यह व्यवस्था?

समय आ गया है कि हम दलगत राजनीति से हट कर अपने संवाद और चर्चा का विषय व्यवस्था को बनायें। धैर्य के साथ। तो शायद कुछ वर्षों में एक उजाले की झलक मिले
आज का सार्वजनिक और व्यस्कतिगत जीवन दोनों ही विरोधाभासों से भरा पड़ा है। आधुनिक विकास और पर्यावरण एवं natural रिसोर्सेज के बीच विरोध। पर्यावरण और gdp के बीच टक्कर। gdp और विकास बढ़ेगा तो पर्यावरण और प्रदूषण पर बुरा असर होगा। प्राकृतिक संसाधन घटेंगे। इत्यादि इत्यादि। अब देखिए रेप होते है तो हथियारों की मांग बढ़ती है। रेप को हथियारों से रोकने की सोच होना स्वाभाविक भी है। पर इसी सब को यहां विरोधाभास कहा जा रहा है।

और देखिए। प्रायः सभी डॉक्टरों और मेडिकल उद्योग के फरेब से परिचित हैं पर हम इतने असहाय हैं कि बीमार पड़ने पर उन्ही के पास जाना मजबूरी है। बच्चों को ईमानदार, संवेदनशील , अच्छा आदमी बनाना चाहते हैं फिर साथ ही competetion के लिए तैयार और प्रैक्टिकल और 'स्मार्ट' भी बनाना चाहते हैं। इसमे भी कहीं विरोधभास है।

अच्छा खाना चाहते है पर किसान रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल करने को मजबूर है।

फ्रीडम चाहते है पर फ्रीडम किस ब्रांड की बोतल का स्वच्छ पानी पियें, इतने भर में सिमट गया है। तालाब, झील, नदी या नल से स्वच्छ पानी मील इसका फ्रीडम नही है।

इसी तरह के जीवन के प्रत्येक आयाम में आपको मजबूरी, असहायता और विरोध नज़र आएंगे।

मेरा मानना है कि वर्तमान राष्ट्र राज्य व्यावस्थस, वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में इसका समाधान है ही नही। हमारे साथ वैश्विक स्तर पर खेल यह खेला जा रहा है की हमे यह मनवा लिया गया है कि इस मौजूदा व्यवस्था के अलावा और कोई विकल्प है ही नहीं।

इसपर विचार किया जा सकता है। इन तथाकथित दिखनेवाली मजबूरियों को एक बार अपनी कल्पना में दूर करके सोचने की ज़रूरत है। उस दुनिया में ठाठ होगा, ऐय्याशी नही। needs और wants में फर्क होगा। और महत्व needs को दिया जाएगा। उस दुनिया में संवेदनशील हो कर खर्च या व्यय किया जाएगा। उस दुनिया में दिखावे पर टोका जाएगा। उसमे होने पर जोर होगा, दिखने/दिखाने पर नहीं। बस इतना । शेष बाद में
अपनी बोली में लिखने का मज़ा ही कुछ और है। कितनी सहजता अपने आप आ जाती है। अँग्रेजी ने कितना कबाड़ा किया है - दिमाग का, सोच का, दृष्टि का, सोचने के ढंग का - इसका मूल्यांकन होना अभी बहुत दूर की बात है। जो थोड़े से लोग और इनकी संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है, अपनी भाषा से दूर हो गए और अँग्रेजी को जबरन गले लगा लिया है वे न इधर के न उधर के वाली हालत में हैं। हम अँग्रेजी के चक्कर में अपने सुंदर और बड़े अर्थ खोटे जा रहे हैं। जैसे धर्म एक शब्द  जिसका अनुवाद अँग्रेजी में मेरे जैसे आदमी के लिए तो संभव नहीं। इसका अनुवाद religion करना महा मूर्खता है, पर यह मूर्खता हमारा पढ़ा लिखा पर अशिक्षित समाज करे जा रहा है। इसी प्रकार एक और सुंदर शब्द स्वतन्त्रता है जिसका अनुवाद अङ्ग्रेज़ी में हो ही नहीं सकता पर हम मूर्खता में freedom, independence इत्यादि करते जाते हैं। इसी तरह के तमाम शब्द सिर्फ हिन्दी ही नहीं हमारी भाषाओं और बोलियों में हैं जिनके अर्थ सुंदर भी हैं, वास्तविकता के ज़्यादा नजदीक भी हैं और हमारे स्वभाव के अनुकूल भी हैं। पर हमने मान लिया है की अङ्ग्रेज़ी ऊंची भाषा है और जो हमारे पास है वह तो उसमे होगा ही और शायद हमसे ज़्यादा ही होगा।

पढ़ा लिखे हिन्दुस्तानी से ज़्यादा आत्म-संकोची (self conscious) शायद ही कोई और मनुष्य प्रजाती हो। वह अपने को और अपने समाज को, देश को, अपनी नज़र से देखता ही नहीं। हमेशा दूसरों की नज़र से। हमने अपनी सहजता खो दी है। हम जाने-अनजाने नकलची हो गए हैं। एक अजीबो-गरीब हालत हो गई है हमारे पढे लिखे की। नेहरू जी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को बाध्य सा कर दिया की औपचारिक आयोजनों पर धोती न पहन कर शेरवानी और चूस्त पाजामा पहने। हमे सोचना चाहिए इसके पीछे क्या मानसिकता काम कर रही थी। और यह कितनी गहरी बैठी हमारे अंदर की उनके विपक्ष वाले मसलन मोदी जी ने भी उस मानसिकता को अनजाने ही सही, गले लगा लिया। कभी कभी, नहीं शायद बहुदा, छोटी छोटी बातों मे बड़े मसले छुपे होते हैं। जो समाज सहज नहीं होता - और यह बात हरेक पर भी लागू होती है - वह नकलची हो जाता है और उसे पता भी नहीं चलता। वह कृत्रिमता में जीता है, मौलिकता खो देता है। हमारा पढ़ा लिखा समाज TV अंकरों से लेकर हमारे राज नेता सभी दलों के (राहुल गांधी, मोदी जी, जेटली, सिंधिया, पासवान के बेटे हो या मुलायम के) हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी तकरीबन सभी ऐसे ही हो गए हैं। फर्क बहुत सतही है। इसलिए भी भाजपा और कांग्रेस की लड़ाई बेबुनियाद मानता हूँ। जे एन यू का विवाद भी। मसला कुछ और है जहां ध्यान जाने मे न जाने कितना वक्त लगेगा।
यह शिक्षा जो पिछले 200 वर्षों से हमे मिल रही है,  दिमाग को तंग तो कर देती है। अहंकार अलग से। और यह अहंकार दो तरफा तलवार की तरह काम करता है। एक तरफ अपने ही साधारण लोगों सेआपको दूर कर देता है। उनकी बातें तो होती हैं पर उनकी सोच के प्रति कोई सम्मान नही होता। उनके प्रति अधिक से अधिक बेचारगी का भाव होता है। अगर कोई ईमानदार कोशिश करता है तो उन्हें अपने जैसा बनाने की। अपने को उनके जैसा बनने की तो सोच बहुत दूर की कौड़ी है।

सुना था। गलत ही होगा। सोनिया गांधी जब कांग्रेस में सक्रिय हुई तो बिहार के सीताराम केसरी जी अध्यक्ष हुआ करते थे। बिहार का साधारण आदमी, अगर लुटियन की दिल्ली से संस्कारित होने से वंचित रह गया हो, तो सरसों के तेल से बड़ा प्रेम होता है। वह इसे खाता भी है और लगाता भी है। और यह अच्छा भी है,  विशेषकर ठंड के दिनों में। केसरी जी होशियार थे पर थे देसी, सरसों के तेल से प्रेम था, उन्हें। वे olive oil से कोसों दूर थे। अब सोनिया जी ठहरी olive oil के देश से। उन्हें सरसों से बदबू आती थी। और केसरी जी को खुशबू। और फिर सोनिया जी गोरी भी हैं। जैसे भी अंग्रेज़ी उनकी हो पर फिर भी उनकी हिंदी से उनकी अंग्रेज़ी ज़्यादा अच्छी थी। केसरी जी को अंग्रेज़ी शायद ही आती हो। तो टकराव तो होना ही था। जिस दिल्ली का निर्माण कांग्रेसी राज में 60/70 सालमें हुआ उसमे सरसों से बदबू आएगी ही। केसरी नई को हटना पड़ा। एक बसर फिर सरसों बेचारी olive से हार गई।

आपमुझे शायद सिरफिरा समझेंगे कि क्या ऊटपटांग बातें कर रहा हूँ। पर करने दीजिए। इतने समझदार पोस्टों के बीच, इतने क्रांतिकारी विचारों के बीच, इतने संवेदनशील लोगों के बीच सिरफिरों को भी थोड़ीसी जगह दे दीजिए। हमे आधुनिकफैशन समझ तहिआ रही।विवेक है, दिमाग है? यैसा शिक्षा ने सबको फैशनेबल बना दिया है।पता नही। olive oil सरसों पर हावी रहेगा? क्या यही नियति है हमारी?
जैसे धर्म का अर्थ संकीर्ण हो कर सिर्फ सम्प्रदाय या religion में सिमट गया है वैसे ही राजनीति का अर्थ सिमट कर दलगत राजनीति और चालाकी या बहुत हुआ तो कूटनीति (मुम्बई में जो हुआ, उस तरह की हरकतें) में सिमट गया।

लेकिन जैसे धर्म का असली अर्थ व्यापक और सुंदर है वैसे ही राजनीति का भी। और उस राज नीति में चालाकी, पैंतरेबाजी इत्यादि इत्यादि का स्थान नही। आज तो इसी अर्थ में राजनीति को लिया जा रहा है। असल मे तो राज नीति का मनुष्य के मूलभूत स्व-भाव, उसकी मूलभूत आकांक्षाओं से और विधान से साम्य होना आवश्यक है। नहीं तो वह राजनीति नहीं सिर्फ साम दाम दण्ड भेद से सत्ता हथियाने का खेल भर है।

मेरी बात बेकार की और 'बड़ी बड़ी' लग सकती है पर मेरा मानना है जिस प्रकार की राजनीतिक बहसें और तंज़ जिसे सोशल मीडिया हम कहते है उस पर हो रही है उससे कुछ निकलने वाला नही। जो राजनीति (दोनों तरफ से) चल रही है उससे कुछ निकल ही नही सकता। सामान्य आदमी से इस वर्तमान (सब तरह की ) राजनीति और  मीडिया को कोई सरोकार रह नही गया है।

तो क्या यह सम्भव है कि हम किस प्रकार का देश और समाज चाहते है, भले ही उसकी सम्भावना हमे आज दूर की कौड़ी लग रही हो, उसकी कल्पना करें और साथ ही इसका की उस तरह का देश समाज अगर मूर्त रूप लेता है तो वहां की व्यवस्थाएं कैसी होंगी?
दलगत राजनीति की सीमाओं में हमें समस्या की न जड़े दिखाई देती हैं और न ही समाधान। यह एक पेंच है। आधुनिक राष्ट्र को सशक्त समाज भाता नही। उसे individual से समस्या नहीं, समाज से है। individual राज्य व्यवस्था को चुनौती नहीं दे सकता, समाज दे सकता है। इसलिए आधनिकता में व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिलता रहता है और इस प्रवृत्ति को बढ़ा कर समाजों को तोड़ा जाता है। और व्यक्तिवाद जब बढ़ता है तब तुलना की प्रवृति बढ़ती है, होड़ बढ़ती है। यह प्रवृत्ति बढ़ती है तो खपत बढ़ती है, उपभोग बढ़ता है, बाजार को फायदा होता है। gdp बढ़ती है। राज्य व्यवस्था ठीक ठाक चलती है। individual भी खुश। राजयभी समृद्ध।

ध्यान रहे आजकल जिसे सिविल सोसाइटी कहा जा रहा है वह समाज नही। सिविल सोसाइटी तो किसी एक आध ज्वलंत मुद्दे पर कुछ समय के किये साथ आती है फिर बिखर जातीहै। उसे सिर्फ व्यक्तिगत विरोध का भाव जोड़े रखता है। वह समाज नहीं individuals का समूह होता है। इसमें और समाज में कोई साम्य नही। इसे एक मानना समाज को न समझ पाने का संकेत है।

समाज तो सभ्यतागत और सांस्कृतिक मान्यताओं में ऐक्य की वजह से होता है। खास समाज के लोगों की जीवन शैली, रीति रिवाज, उनकी मान्यताएं, रहन सहन, होने की वजह से वह समाज कहलाता है। समाज की ताकत ही है की उनका लगभग एक जैसा होना और मानना ही उन्हें एक रखता है और उससे शक्ति मिलती है। समाज राज्य व्यवस्था को चुनौती देने की शक्ति रखता है इसलिए वह आधुनिक राज्य व्यवस्था को सुहाता नहीं। समाज स्वतः ही रहन सहन को भी एक मर्यादित सीमा में रखता है इसलिए बाजार और उपभोगतवाद को भी समाज पसंद नही।

आधुनिक व्यवस्था में इंडिविदुआलिस्म को बढ़ाया जाना प्रायः अनिवार्य सा ही है। individualism का राजनैतिक पक्ष फिर 'अधिकार' की तरफ ले जाता है। ध्यान रहे क्योंकि समाज में मर्यादा का भाव प्रबल होता है इसलिए वहां अधिकार नहीं 'जिम्मेदारी' की प्रबलता होती है।

आधनिकता मैं individualism और उससे जुड़े भाव या विचार भी, 'अधिकार' को बढ़ावा मिलता है। पर individual की क्योंकि अपनी कोई ताकत प्रायः नगण्य सी ही होती है इसलिए अधिकार सिर्फ एक विचार के रूप में ही रह जाता है, वास्तविकता में उसकी परिणीति होती नहीँ ( अधिकार तो है पर लगाते रहिये कोर्ट के चक्कर! पैसा है तो बात बन सकती है वरना undertrial कितने हैं देश में, गिन लीजिये!).

तो एक तरफ आधुनिक व्यवस्था आपको (संविधान में/से) अधिकार दे कर खुश कर देती है पर वास्तविकता अलग होतीहै। इसे ध्यान देने से देखा जा सकता है। कोई मुश्किल बात नहीहै।
इसे देखने पर आधनिकता का दर्शनीय पक्ष और उसकी वास्तविकता के बीच के विरोधाभासों को समझने की ज़रूरत है। वोट का अधिकार दे दिया पर जिसे वोट दिया वह अपनी दिशा बदल लें तो आप कुछ नही कर सकते। अभी हाल मैं महाराष्ट्र मेजो हुआ उससे समझा जा सकता है। यह पहली बार नही हुआ। न ही आखरी बार। फिर भी हम आधुनिक लोकतन्त्र की दुहाई देते रहतेहैं!

तो आधनिकता देखने में कुछ और असलियत में कुछ और ही है। आधुनिक मूल्य भी ऐसे ही हैं। दिखाने के लिए, बात करने के लिए, और असलियत में नदारद। individual की कोई पैठ, कोइबैठक नही होती। वह बेचारा कहाँ से अपनी शक्ति को ले, कहां से शक्ति derive करे? समाज अच्छा, बुरा जैसा भी है उसकी जड़े होती हैं, वही से शक्ति मिलती है। individual की तो जड़ ही नही होती। उसकी समझ का कोई पैंदा ही नही। तो उसके विचार बनाये जाते है - आधुनिक शिक्षा और मीडिया द्वारा। वे जैसे उसे ढाल दें। और यह दुनिया तो फैशन की दुनिया जैसी होती। आज कुछ कल कुछ। कोई ठौर नहीं। इसी दुनिया से व्यक्ति कभी फटी जीन्स पहनने लगता है, कभी तंग कभी चौड़ा कभी लंबे बाल, चोटी, कभी पूरा साफ। नांच दूसरे नचवाते हैं, भ्रम में रहता है 'मेरी मर्ज़ी'. पुरुष महिला जैसे और महिला पुरुष जैसे बनने में अपने को आधुनिक बना रहे हैं।

आधनिकता बाहर से कुछ, अंदर से कुछ और। बाहर से सेक्युलर, अकड़,मूल्यों की बात करने वाला,  अंदर से डरा हुआ, अपने को हर समय दूसरे से तुलना करता हुआ और छोटा महसूस करता हुआ। बाहर से अनीश्वरवादी अंदर में अपने भगवान से कुछ मांगता हुआ। कुल मिला कर आधनिकता छद्म से भरी है। आधुनिक व्यवस्थाएं इससे साम्य रखते हुए इस भ्रम को बनाये रखने में सहायक हैं। अभी इतना ही।
एक तरफ कुवां और दूसरी तरफ खाई हो तो क्या कीजियेगा? तो पहले तो इन दोनों को अच्छी तरह से देख समझ लिया जाय। कभी कुएं के पास जा कर खाई के पास जाने की इच्छा करने लगे तो अपनी याद्दाश्त पर ज़ोर डालना जरूरीहै। दूर के ढोल सुहावने होते हैं वाले मुहावरे को याद करना चाहिए। नही तो डोलते रहेंगे। कहने का अर्थ है इस स्थिति में आवश्यक है कि हमारा दोनों से मोह भंग हो। और फिर हमें इस व्यवस्था, जिसकी यह कुआं और यह खाई पैदाइश हैं, को ठीक से समझने का प्रयास करना चाहिए। इसमे गाँधी जी का 1909 में लिखा "हिन्द स्वराज" मदद कर सकता है। उसे धीरे धीरे पढ़े। जल्दबाजी में नहीं, धीरे धीरे। पढ़े फिर मनन करे। फिर थोड़ा पढ़े फिर मनन करे। अपने पूर्वाग्रहों के प्रति सचेत हो कर, उनसे थोड़ी देर के लिए दूरी बना कर पढ़े। आधुनिक व्यवस्थाएं मायावी हैं - कैसे? यह समझ आये तो भ्रम मुक्ति हो। यह ज़रूरी है। मोह भंग और भ्रम मुक्ति। यह हो तो कुछ होने की संभावना खुलेंगी। नही तो कभी नागनाथ अच्छा लगने लगेगा और कभी सांपनाथ।
मुझे याद आती है विलियम बेंटिक भारत के गवर्नर जनरल, ने 1818 में एक पत्र लन्दन के बड़े अधिकारियों को एक पत्र लिखा था जिसमे वो कहते हैं कि 'अब हमें (भारतीयों से) घबराने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वे अब अपने रीति रिवाज छोड़ रहे हैं, दान दक्षिणा जो साधुओं, फकीरों इत्यादि को देते थे वे अब देना बंद कर दिया है और उस बचे हुए पैसे को वे अब हमारी (अंग्रेज़ों की) नकल करने और हमे दावतें, इत्यादि दे कर हमें खुश करने में वह पैसा खर्च करने लगे हैं'। उनकी समझ की दाद देनी पड़ेगी। जब नकल होने लगती है तो समझ लीजिए जिसकी नकल की जा रही है उसने बाजी जीत ली और जो नकल कर रहे हैं, उनका बेड़ा गर्क।

यही बात 1853 में चार्ल्स ट्रेवेलियन करता है। वह कहता है 'मैं 12 वर्ष भारत में रहा। पहले 6 वर्ष दिल्ली में। वहां रहते हुए एक रात भी चैन की नींद नहीं सो पाया। हर रोज़ हमे खतरा रहता था की कहीं से बगावत न हो जाय। फिर आखिर के 6 वर्ष कलकत्ता रहा और हर रोज़ चैन से सोया क्योंकि वहां का पढ़ा लिखा बर्ग अब हमारी नकल करने में लगा है।

यह नकल करने का रोग हमारा पुराना है। अब तो यह और सूक्ष्म और भोंडा भी हो चला है। जिस देश में फटे कपड़े को पहनना अपशुकन माना जाता था, जहां गरीब से गरीब भी जल्दी से फटा कपड़ा नहीं पहनता था, भले ही थोड़ा मैला पहन लें, उस देश का जागरूक युवा जो 'कैंडल मार्च' और 10 रुपये फीस बढ़ने पर जुलूस निकाल सकता है - इतना जागरूक और सोचने समझने वाला है - वह 5/10 हज़ार की फटी जीन पहनने में अपनी शान समझता है। अब किसी को तो सोचना चाहिए कि यह युवा क्या वाकई सोचता है? या ऐसा सिर्फ 'मानता' है कि वह 'सोचता' है। इन दोनों में तो बड़ा फर्क होता है। अंग्रेज़ों के ज़माने के भारतीय जो उनकी नकल करते थे वे भी सोचते होंगे की वे सोच समझ कर कर रहे है?

नकल करने वाले को लगता है कि वह सोच कर कर रहा है, जो कर रहा है।

आज उन बातों को 200 वर्ष हो गए। अंग्रेज़ चले गए। दुनिया से उनका बोलबाला भी उठ गया। पर पिछले 70/80 वर्षो से उनके भाई बंद अमरीकन आ गए , उनकी जगह। पर हम वहां के वहां रहे। नकल किसकी करनी है, उसकी दिशा थोड़ी सी बदल गई बस। नकल अति सूक्ष्म रूप जब लेती है तो विचारों के रूप में होती है। पहले उसका नेतृत्व राजा राम मोहन रॉय जैसे लोगों ने, ब्रह्म समाज के लोगों ने किया होगा अब लिबरल सोच वही काम कर रही है। हिन्द स्वराज में गाँन्धी जी ने आधुनिक व्यवस्था के मायावी चरित्र को बेनकाब करने की कोशिश की। पर लिबरल लोग उनके नाम की माला भी जपते हैं और उन्हें समझने की ज़रूरत भी नही समझते। उनका सनातनी हिन्दू होना उन्ही भाता नही। तो उन्हें सेक्युलर बनाने पर तुले हैं, बल्कि बना ही दिया। जैसे कबीर को उन्होंने सेक्युलर बना दिया। कबीर ने जो अपने गुरु पर लिखा, राम पर लिखा वह सब गायब कर दिया गया है, लगभग।

अब विचारों का फैशन चला है। इस फैशन में कहीं भी सनातनी बू आये तो उससे परहेज का दिखावा करना भी फैशन है। सोचना जब बन्द हो तो और विचारों में ध्रुवीकरण ने पैठ जमा ली हो तो फिर सोचते हैं कि सोचते हैं। उसमें अहंकार, भय और दिखावे का एक रोचक मिश्रण होता है। आज यही हो रहा है