Monday, June 20, 2016

भारत का आत्म-संकोच



हमारा देश आत्म-संकोची हो गया है। खुल कर अपने अंदर की बात आसानी से नहीं करते हम लोग। जिस माहौल में होते हैं वहाँ के मुहावरे और वहाँ जो चलता है, उसका अनुमान पहले लगाते हैं, हिसाब- किताब लगाते हैं, और फिर बोलते हैं। इसे भले ही कुछ लोग समझदारी कहें पर इसमे डर और आत्म-संकोच (self-consciousness) ज़्यादा है। इसका मेल, अंदर के निजी अनुभव, निजी विश्वास के साथ बैठता है या नहीं, इस ओर ध्यान नहीं रहता। एक तरह का मुखौटा पहने रखते हैं। ये मुखौटे भी नाना प्रकार के होते हैं। घर और बाहर की दुनिया में तो अलग होते ही हैं। बाहर की दुनिया में भी भिन्न-भिन्न प्रकार के। सेमीनारों के, राजनीतिक माहौल के बीच वाले, अपने मित्रो की मंडली के बीच (और मित्रो की मंडलियाँ अगर अलग अलग हुई तो ये मुखौटे भी उनके, इन विभिन्न मंडलियों के बीच बदलने पड़ते हैं), काम धंधे वाले माहौल मे अलग, हिन्दूओं के बीच अलग, मुसलमानों के बीच अलग, विभिन्न जाति समुदायों के बीच अलग, इत्यादि इत्यादि।
यह रोग इक्के दुक्के में होता तो इसे व्यक्तिगत रोग के रूप में देखा जा सकता था। पर यह तो हमारे पूरे पढे-लिखे समाज में फैला हुआ है। अंग्रेजों के जमाने से घर और बाहर की दुनिया के बीच फासला बढ्ने लगा। और यह लगातार बढ़ते जा रहा है। उसके पहले घर और बाहर के बीच नज़दीकियाँ थीं। एक ही बोली घर में, वही बाहर भी। उठना बैठना, खान-पान, बातचीत के मुद्दे, रीति रिवाज, पूजा- भजन, इत्यादि अनेकों बड़े-छोटे आयामों में घर और बाहर की दुनिया में ज़्यादा फर्क नहीं था। अंग्रेजों के समय से सब तेज़ी से बदलने लगा। घर पहले जैसा रहा या बहुत धीमी गति से बदला और बाहर की दुनिया तेज़ी से बदलने लगी। इसका असर आदमी और औरत के रिश्ते पर भी पड़ा। पुरुष और महिला के बीच फासला बढ़ा, पुरुषों की दुनिया तीव्र गति से बदलने लगी, महिलाओं की वैसी ही रही या बड़ी धीमी गति से बदली। इस दौड़ में महिलाओं की शक्ति घटती चली गई। यह घटना बहुत पुरानी नहीं है पर हमे ऐसा समझाया गया और हमने अच्छे विद्यार्थी की तरह यह समझ लिया की इस देश में हमेशा ही ऐसा रहा है। यही बात विभिन्न जतियों पर भी लागू होती हैं। अंग्रेजों से पहले विभिन्न जातियों के बीच सहज संवाद चलता ही रहता था। सब अपने अपने ढंग से रहते थे, उनके कुछ तरीके अलग होंगे (इसी को तो विविधता कहते हैं) पर उनके बीच संवाद होते रहता था, उनके बीच की दूरियाँ ज़्यादा नहीं थी। ये ढंग उनकी अपनी अपनी जातियों की विशेष पहचान थी। अंग्रेजों से जिन लोगों ने बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी उनमे आदिवासी भी थे, आज की भाषा में जिन्हे पिछड़ा और दलित कहा जाता है, वे भी थे। हमारे इतिहासकारों ने यह जानने की ज़रूरत नहीं समझी है कि अंगेज़ों से लड़ाई में रानी झाँसी के अलावा कितनी ही वीरांगनाओं ने घोड़े पर बैठ कर, तलवार और ढाल से उनका सामना किया। झलकारी देवी का एक नाम कुछ एक लोग जानते है, शेष महिलाओं का नाम भी आना चाहिए। सोचने की बात है की ये तथाकथित पिछड़े और दलित जातियों से आने वाली महिलाओं ने क्या एक ही दिन में घोड़े पर बैठना और तलवार और ढाल चलाना सीख लिया होगा क्या? निश्चित तौर पर यह परंपरा रही होगी। पर हमे एक ऐसा अंदाज़ दिया गया कि लड़ना (घोड़े पर बैठना, तलवार चलना सिर्फ राजपूत, क्षत्रिय ही करते थे)। कहने का अर्थ सिर्फ यहाँ इतना ही है कि अंग्रेजों से आने से पहले हमारे समाज मे ज़्यादा बराबरी थी – पुरुष महिला के बीच और विभिन्न जातिगत समाजों के बीच। यदि इसकी भी छानबीन करी जाय ठीक से कि आज़ादी के वक्त भी जितने राजा थे विभिन्न 500 से ज़्यादा रियासतों के, उन राजाओं की असली जाति क्या थी, तो सब राजपूत या क्षत्रिय नहीं निकलेंगे, उनमे से कई पिछड़ी और दलित जातियों से भी निकलेंगे – यदि सही ढंग से शोध हो। इस प्रकार की शोध हमे करनी चाहिए। रानी रासमानी जिसने कलकत्ता की विक्टोरिया की ज़मीन, अंग्रेजों को दान में, गोचर भूमि की शर्त पर, दी, वे पिछड़ी जाति की थी, जिनके यहाँ कोई ब्राह्मण पूजारी बन कर काम नहीं करना चाहता था और तब स्वामी रामकृष्ण परमहंस वहाँ लाये गए। हम इन तथ्यों को जोड़ते नहीं हैं और सेमीनारों में, सार्वजनिक रूप से रटे-रटाये, झूठे मुहावरों में बोलते चले जाते हैं क्योंकि आदत पड़ गई है। यही चलता है, चलाते रहो। और बुद्धिजीवी वर्ग को भाजपा, और आर एस एस का ऐसा खौफ है कि कोई उन पर यह तोहमत लगा दे तो क्या होगा? इस भय से जो रहा-सहा है वह भी जाता रहता है।
गांधी की बात हम करते हैं पर उनकी अहम बातों को या तो नज़रअंदाज़ करते हैं या छुपा जाते हैं। वे साधारण आदमी को बेचारा नहीं समझते थे, उन्हे तो साधारण में शक्ति दिखती थी, साधारण से वे शक्ति प्राप्त करते थे। और उन्हे साधारण में इस शक्ति का श्रोत भारतीयता (सभ्यता) में दिखता था और ईश्वर में उसकी आस्था में। उनकी ईश्वर में आस्था साधारण की वजह से आई या अलग तरीके से, मैं नहीं कह सकता। पर इसमे उनके और साधारण के बीच तालमेल था। यही उनको भारत के लोगों से जोड़ता था। भारत के साधारण की बुनियादी समझ के प्रति वे नतमस्तक थे, और ईश्वर के प्रति आस्था भी उनमे अटूट थी। इन दोनों के प्रमाण उन्हे मिलते भी रहते थे। उन्हे मिलते इसलिए थे कि वे पहले से इसके प्रति जागरूक और संवेदनशील थे। हम नहीं हैं इसलिए हमे प्रमाण भी नहीं मिलते। भारत के अन्य नेता बाएँ (लेफ्ट) से दायें (राइट) तक किसी में भी ये दोनों ही गुण नहीं थे। उन्हे भारत का साधारण बेचारा और/या मूर्ख ही लगता था जिसे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। लोहिया हो, जय प्रकाश हो या नेहरू हो, या तिलक हो, मालवीय जी हों, हेग्डेवर हों, अंबेडकर हों, जिन्नाह हों – कोई भी हों।
इस गुत्थी को कि भारत के साधारण में कौन सी ताकत है जिसे गांधी देख पाते थे विचारणीय बिन्दु है। यदि हम अपने ही बनाए आत्म-संकोच से उबर पाएँ तो आसानी होगी।

Sunday, June 19, 2016

साधारण और विशेष: खुला मैदान या कटघरे


पिछले वर्ष फारबिसगंज, बिहार के उत्तर में नेपाल सीमा से लगा हुआ एक कस्बा जो अब छोटे मोटे शहर का रूप ले रहा है  और जहां मैंने अपने स्कूली जीवन की अधिकांश छुट्टियाँ बिताईं हैं, एक अरसे बाद जाना हुआ। फणीश्वर नाथ रेणु का गाँव यहाँ से पास ही है। एक तरफ बंगाल दूसरी तरफ नेपाल। कोसी का इलाका जो अपना रास्ता बदलने के लिए मशहूर रही है। बहुत ही उपजाऊ मिट्टी। बंगाल के इतने पास होने की वजह से फारबिसगंज में बंगालियों की अच्छी ख़ासी तादाद हुआ करती थी। बनफूल और सतिनाथ भादुरी यही आस पास पुर्णिया और कटिहार के रहने वाले थे। पर इस इलाके के बंगाली सहज सरल थे। कलकत्ता के बंगालियों की अंग्रेज़ियत और अकड़ से कोसो दूर।

बंगाली हों और फुटबाल का खेल न हो यह कैसे हो सकता है? और हमारे यहाँ का फुटबाल का स्तर काफी अच्छा माना जाता था। यहाँ के  खिलाड़ी कलकत्ता की बड़ी टीमों जैसे मोहन बागान, मोहमेड्डन स्पोर्टिंग, ईस्ट बंगाल की टीमों में खेले हैं। पिछले साल जब वहाँ गया तो किसी से पूछा कि भई फुटबाल का क्या हाल है? तो पता चला अब कोई खेलता नहीं। न खेलने के मैदान बचे हैं और न ही किसी को कोई खास शौक रह गया है। यानि साधारण आदमी और साधारण चीजों के लिए जगह सिमटती जा रही है। खेलना है तो खेल की अकादमियों में खेलो। और वहाँ साधारण नहीं विशेष लोग ही जाएँगे। खास कपड़े, जूते और अन्य तामझाम के साथ। नंगे पाँव, चलते फिरते नहीं खेल सकते अब। यही बात हर क्षेत्र में है। साधारण की जगह गायब होती जा रही है।

मेरे दादा या शायद बाबूजी को भी कोई उनका परिचय पूछता तो वो शायद कहते कि मैं फलां परिवार से हूँ, फलां का बेटा या पोता हूँ, हम फलां धंधा करते हैं, फलां गाँव या मोहल्ले में रहते हैं। बोलने वाला और सुनने वाला, दोनों संतुष्ट हो जाते इस तरह के कुछ जवाब से। अब ज़रा सोचिए कि आज के समय कोई ऐसा जवाब दे तो क्या होगा? अब जवाब में परिवार, कुटुंब, गाँव या मोहल्ले की बाते नहीं हो सकती। अब परिचय व्यक्तिगत तौर पर ही देना होगा। अपने नाम के अलावा, पढ़ाई की डिग्री, किस जगह नौकरी और हो सके तो उससे तनख्वा का अनुमान - ऐसा कुछ परिचय देना ज़रूरी हो गया है। यानि हम से, मैं की तरफ, तरक्की की है, हमने। ठीक है, पर इसका असर देखिये कि सब को 'विशेष' बनना है। और विशेष की शर्त ही यह है, उसमे निहित ही है, कि हज़ार, दस हज़ार या लाख में एक। नहीं तो विशेष कैसा? तो यह लाज़मी है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग विशेष नहीं बन सकते। पर सपना सबको विशेष बनने का दिया जा रहा है। जो नहीं बन पाते उनपर क्या गुजरती होगी, कल्पना करना होगी ।

आई आई टी में हर साल 2-4-5 लोग तो आत्म-हत्या करते ही हैं। कोटा में और कोटा जैसी और कई जगहों पर जहां कोचिंग सेंटर चलते हैं, वहाँ, वे जो आई आई टी या ऐसी ही किसी जगह निकल नहीं पाते, यही हाल है। हर साल 100-200 की तो बलि चढ़ती ही होगी। पर उनका क्या जो आत्म-हत्या तो नहीं करते पर विशेष भी नहीं बन पाते? इनमे से अधिकतर उम्र भर के लिए एक घाव लेकर जीते हैं और इस घाव की बात भी, वे किसी से नहीं कर पाते। यह घाव उनमे हीनता का भाव भर देता है, उन्हे सहज नहीं होने देता। इस घाव को वे झूठे अहंकार से ढकने की कोशिश करते हैं। इस घाव का असर उनके निजी रिश्तों पर भी पड़ता होगा। कितनी बड़ी संख्या में यह हिंसा हमसे, अनजाने में ही सही, हो रही है। इसका कितना बड़ा मूल्य हम चुका रहे हैं, इसका हिसाब लगाना चाहिए। एक दिन कोई हड़ताल हो जाती है, जाम लग जाता है, बाढ़ आ जाती है, तो नुकसान का हिसाब लगाया जाता है। इस तरह विशेष बनने की बीमारी के चलते मनोवैज्ञानिक रूप से समाज का जो नुकसान लगातार होते जा उसका हिसाब लगाना ज़रूरी है। यह बात बिना हिसाब लगाए भी आसानी से समझी जा सकती है पर जिस प्रक्रिया के तहत यह हिंसा हो रही है, उस प्रक्रिया ने हमारा मानस ऐसा बना दिया है कि आंकड़ों के बिना सीधी सीधी बात भी समझ नहीं आती। हिसाब लगाना इसलिए भी ज़रूरी है। जिस प्रक्रिया ने मनुष्य को एक संसाधन बना के छोड़ दिया है  उन्हे, उस नज़रिये से ही सही, इस नुकसान के बारे में सोचना चाहिए। एक कुंठाग्रस्त इंसान कितना 'प्रोडक्टिव' होगा?

हमारे यहाँ तो कम से कम साधारण के लिए अभी हाल तक करीब 40-50 वर्ष पहले तक काफी जगह हुआ करती थी। साधारण सिर्फ आदमी नहीं, साधारण क्रिया-कलाप भी। साधारण मानस में सहयोग की भावना होती थी, साधारण संवेदनशील भी था, संतोषी भी, थोड़ा बहुत झूठ, थोड़ा बहुत लालच, थोड़ा बहुत गड़बड़ होता रहता था पर कुल मिला कर काम चल जाता था। इस सहजता को हम खो रहे हैं।

विशेष और सहज में एक विरोध है, विशेष का मेल तीव्रता, गति की तीव्रता, अधैर्य, आक्रामकता, हिंसा इन सब का एक मेल है। इस जल्दबाजी का असर दिमाग पर भी पड़ा है। तुरंत समझना है, समय नहीं है। और जो जितना जल्दी समझे, वह उतना होशियार भी दिखाई देता है! जल्द समझने में कटघरे (categories) मदद करती हैं, कुछ कुछ वैसे ही जैसे गणित का सवाल सूत्रों को याद रखने से सरल हो जाता है। सूत्रों के मार्फत सवाल का (सही) जवाब तो मिल जाता है पर कोई ज़रूरी नहीं कि हल करने वाले को कुछ भी समझ आया। सूत्र तो मात्र एक तरीका देता है, बुनियादी समझ नहीं। आज की दुनिया में, हर क्षेत्र में कटघरे हावी हो गए है। काला या तो गोरा; सुबह या तो शाम, दिन या तो रात और धीरे धीरे बात आगे बढ़ती है पुरुष-महिला, हिन्दू-मुसलमान, सेक्युलर-कट्टरपंथी, पूरब-पश्चिम इत्यादि इत्यादि। ध्रुविकरण - या ये या वो - बीच में या अगल बगल कुछ नहीं। टी वी वालों के पास समय कहाँ। दो पाटों में सब कुछ बांटने से उनका और सबका, जो जल्दी में हैं, काम आसान हो जाता है। हमारा, विशेष बनने की चाहत में, ऐसा ही दिमाग बन गया है या बना दिया गया है।

कैरना में जो हो रहा है, असली वजहें कौन जानना चाहता है? कोई इस तरह देख रहा है या दिखा रहा है कोई उस तरह। जो पिस रहे हैं, उनकी परवाह किसे है?

साधारण ही श्रेष्ठ





गांधी जी की साधारण एवं ईश्वर में आस्था, यह अनुभव और तर्क दोनों पर आधारित था। साधारण, कोई व्यक्ति विशेष नहीं हुआ करता, बल्कि “साधारण” का सामूहिक (collective) पक्ष ही महत्वपूर्ण है। महात्मा गांधी के लिए इसमें ही भारत की सभ्यता का उज्ज्वल पक्ष झलकता था। यह साधारण कैसे अपने निर्णय लेता है रोजाना की ज़िंदगी में, उन निर्णयों के आधार क्या होते हैं? इन्हे देखने जाते हैं तो एक अलग ही प्रकार की जीवन दृष्टि दिखाई देगी जिसमे चराचर के लिए सम्मान और सभी प्राणियों का समान अधिकार दिखाई देगा, इसमे अधिकार और ज़िम्मेदारी में बहुत फर्क नहीं है। सिर्फ मानव केन्द्रित दृष्टि से अलग है, यह दृष्टि। इसमे होड़, प्रतिस्पर्धा नहीं है, है तो बहुत ही सीमित मात्रा में। इसमे दिखावे को ओछी नज़रों से देखा जाता है, तो होड़ और प्रतिस्पर्धा अपने आप ही नियंत्रित होती है। इसमे विश्वास की दृढ़ता है, ठहराव है, पर बाहरी, छाती फुलाने वाली, कठोरता नहीं, वह तो विशेष परिस्थिति, लड़ाई वैगरा, के समय दिखती है। पर शोर्य है। इसमे सहजता है, इसमे अनिश्चितता को स्वीकारा गया है और अंततः इसमे आस्था भी है कि जो होता है, (आखिर में) अच्छे के लिए ही होता है”। इसमे गज़ब की सहजता है। सहजता यानि अंदर जो हो रहा है (अनुभव, भाव, विचार, इच्छा, मन में) और बाहर जो किया जा रहा है, बोला जा रहा है, दर्शाया जा रहा है, इन दोनों, अंदर और बाहर के बीच एक समरसता (alignment) है, विरोध नहीं। इसी से सहज आत्म-विश्वास भी आता है। यही आदमी को ईमानदार भी बनाती है। अपने से ईमानदारी। इसमे अच्छा होना महत्वपूर्ण है, अच्छा दिखना नहीं।
बदलाव एक सार्वभौमिक सत्य है। किसी भी बदलाव के दो पक्ष होते हैं – उसकी स्थिति और उसकी गतिस्थिति को धुरी के रूप में, अंदर जो घट रहा है उस रूप में, जो है – इस रूप में। और गति यानि जो परिधि पर घटता है, बाहर जो प्रदर्शित होता है, या किया जाता है (करने के रूप में), जो दिखता है, दिखाया जाता है उस रूप में, समझा जा सकता है। हमारे अंदर भाव, विचार, इच्छा, अनुभव, कल्पना इत्यादि – एक स्थिति होती है। यह शरीर के अंगों द्वारा – बोल के, हाव-भाव से, कुछ करके प्रदर्शित होता है। यह है गति
जब गति का स्थिति के साथ तालमेल होता है तो यही सहजता है। यही असली ईमानदारी है। यह वांछनीय भी है। हर आदमी सहज होना ही चाहता है। पर आधुनिकता ने गति और स्थिति के बीच के संबंध को समरस बनाने में एक अच्छी भूमिका के बजाय दोनों के बीच तादात्म्य न रहे ऐसा ही काम किया है। अंदर कुछ और बाहर कुछ और ही। दरअसल आधुनिकता का अंदर की दुनिया (स्थिति) पर कोई ध्यान ही नहीं है यदि ऐसा कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आधुनिकता गति केन्द्रित व्यवस्था है। आपके ज्ञान (जो है, आपकी स्थिति) का आंकलन आपकी डिग्री (गति) से लगाया जाता है। आपका किसी के प्रति सम्मान हो या न हो (स्थिति में) पर आपका प्रदर्शन यदि सम्मानजनक है तो बस काफी है। ध्यान होने पर नहीं, दिखावे पर, प्रदर्शन पर है। इसलिए सारे मूल्य – सम्मान, विश्वास, प्रेम, कृतज्ञता इत्यादि का मूल्यांकन स्थिति से हट कर गति केन्द्रित हो गया है। मनुष्य सच्चाई को गति में ही खोजने लगा है जबकि सच्चाई गति में नहीं स्थिति में होती है। और यही आधुनिक मनुष्य की असहजता और तनाव, संदेह, पीड़ा का बड़ा कारण है।       
भारतीय समाजों में (साधारण में) इसकी गहरी समझ रही होगी। इसलिए यहाँ ऐसी व्यवस्थाएं भी बनी जहां इस सहजता की प्रवृति को प्रोत्साहन मिले। जैसे दिखावे को बुरा माना गया। ज़्यादा भी हो तो उसका दिखावा न हो। कम हो तो समाज की व्यवस्थाएं उसे एक सीमा के नीचे जाने पर संभाल लें। अन्न दान एवं अन्य दानों को महिमा मंडित करने के पीछे भी यह सोच रही होगी। यह अलग बात है कि आधुनिकता ने इसे भी दिखावे में तब्दील कर दिया। पर आज भी मठों, मंदिरों, गुरुद्वारों और (भारत की) मस्जिदों में लंगर और भंडारे की व्यवस्थाएं हैं और बड़े पैमाने पर हैं। कई दसियों लाख लोग हर रोज़ इस देश में इस तरह भोजन प्राप्त करते होंगे, जिसमे करोड़ों रुपये और लोगों का श्रम (दान) लगता होगा। विशेष अवसरों पर तो यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। यह कोई मामूली परंपरा नहीं है जिसपर हमे गर्व होना चाहिए। इस व्यवस्था में अमीर और गरीब के बीच भी कोई खास भेद नहीं होता, न ही विभिन्न जातियों और महिला- पुरुष के बीच।
हमारे यहाँ ईश्वर में आस्था, अस्तित्व में, प्रकृति में आस्था, जो हो रहा है - उसमे आस्था में परिणित होती रही है। सभी कुछ ईश्वर की परम सत्ता का हिस्सा है इसलिए वह सब जो मनुष्य ने नहीं बनाया पर बना बनाया है उसमे भी आस्था। यह एक बड़ी समझ रही है इसलिए हमने हर चीज़ को समझना ज़रूरी नहीं समझा। कोई कीट-पतंग जो नहीं पहचाना गया, उसे भी जीने का हक है, उसकी भी कोई न कोई भूमिका होगी इस अस्तित्व में, जो कुछ दृश्य या अदृश्य रूप से हो रहा है, उसमे।
संभवतः महात्मा गांधी को यह अपने ढंग से, बिना शास्त्रों का विधिवत अध्यन किए, गया। भारत के साधारण का अवलोकन करके, अपने बचपन की यादों के सहारे, उस समय सुने प्रसंगों और कहानियों को सुन कर, और पैनी दृष्टि (अवलोकन, observation) और intuition. आज के पढे लिखे भारतीय में ये गायब से हो गए हैं। न observation है - और है भी तो पश्चिम से प्रभावित दृष्टि (perception) से प्रभावित - और न ही intuitionintuition एक exotic चीज़ हो कर रह गई है। पर intuition संभवतः अपने अंदर विभिन्न संवेदनाओं को खँगालने के बाद एक एहसास जिसमे विश्वास सा होने लगता है, को कहा जाता है। यह खँगालने की प्रक्रिया सीधे सीधे तर्क की प्रक्रिया से अलग होती है। हम, अपने विगत से कटे हुए लोगों को, जिन्हे अपने विगत की जानकारी अधिकतर गलत ही मिली है, को अपने intuition का सहारा लेना पड़ेगा। गांधी लेते थे।